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Astrology News: सनातन धर्म में विवाह से लेकर हर शुभ कार्य और धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी को पति के ‘वाम अंग’ यानी बाईं ओर बैठने की परंपरा है। हिंदू शास्त्रों में पत्नी को ‘वामंगी’ कहा गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ ही है ‘बाईं ओर स्थित होने वाली’। अक्सर लोग इसे केवल एक पुरानी परंपरा मानते हैं, लेकिन वास्तु शास्त्र, ज्योतिष और आयुर्वेद के अनुसार इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ऊर्जा संतुलन का विज्ञान छिपा है।
सूर्य और चंद्र नाड़ी का अदभुत संतुलन
हमारे शरीर में दो प्रमुख ऊर्जा मार्ग होते हैं, जिन्हें सूर्य नाड़ी (पिंगला) और चंद्र नाड़ी (ईड़ा) कहा जाता है।
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सूर्य नाड़ी (दाहिनी ओर): यह ऊर्जा, साहस, निर्णय लेने की क्षमता और अग्नि तत्व का प्रतीक है। पुरुष प्रधान कार्यों में इसकी सक्रियता आवश्यक है।
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चंद्र नाड़ी (बाईं ओर): यह सौम्यता, शीतलता, रचनात्मकता और मानसिक शांति का प्रतीक है, जिसे स्त्री शक्ति से जोड़ा जाता है।
जब पत्नी पति के बाईं ओर बैठती है या सोती है, तो दोनों की ऊर्जाएं मिलकर एक ‘पूर्ण इकाई’ बनाती हैं। यह स्थिति पति की निर्णय क्षमता और पत्नी की मानसिक शांति के बीच एक आदर्श सामंजस्य पैदा करती है, जिससे वैवाहिक जीवन में संतुलन बना रहता है।
शयन और वास्तु का स्वास्थ्य पर प्रभाव
वास्तु शास्त्र के अनुसार, पति-पत्नी के शयन (सोने) की दिशा का सीधा असर उनके स्वास्थ्य और आपसी रिश्तों पर पड़ता है। पत्नी का बाईं ओर सोना चंद्र नाड़ी को सक्रिय रखता है, जिसके कई स्वास्थ्य लाभ हैं:
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तनाव में कमी: यह मन को शांत रखता है और अनिद्रा जैसी समस्याओं को दूर करता है।
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शारीरिक लाभ: चंद्र नाड़ी की सक्रियता पाचन तंत्र में सुधार और हृदय गति को संतुलित रखने में सहायक होती है।
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सकारात्मक ऊर्जा: सही दिशा में सोने से पति-पत्नी के बीच अनावश्यक विवाद कम होते हैं और आपसी समझ बढ़ती है।
वामंगी: केवल परंपरा नहीं, एक वैज्ञानिक जरूरत
पूजा-पाठ के समय पत्नी का बाईं ओर बैठना यह दर्शाता है कि पुरुष की शक्ति तब तक पूर्ण नहीं है जब तक उसे स्त्री की शीतलता और शांति का सहारा न मिले। ऊर्जा के इस असंतुलन को रोकने के लिए ही शास्त्रों में यह व्यवस्था दी गई है। यदि दिशा का पालन न किया जाए, तो ऊर्जा में टकराव हो सकता है, जिससे मानसिक अस्थिरता और तनाव पैदा होने की संभावना रहती है।
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