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Lucknow (UP): उत्तर प्रदेश की राजनीति में कभी ‘मायावती के चाणक्य’ कहे जाने वाले वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस से इस्तीफे ने एक बार फिर सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। राहुल गांधी की टीम के लिए यह खबर तब आई है जब पार्टी यूपी में फिर से पैर जमाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या सिद्दीकी के जाने से कांग्रेस को कोई जमीनी नुकसान होगा या यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक विदाई है?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सियासी सफर कांशीराम के दौर से शुरू हुआ था और 2007 में मायावती सरकार के दौरान वे पश्चिमी यूपी के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम चेहरे बनकर उभरे। लेकिन बीते एक दशक में उनका राजनीतिक ग्राफ लगातार नीचे गिरा है। कांग्रेस में शामिल होने के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सलमान खुर्शीद के साथ मिलकर मुस्लिम वोट बैंक को जोड़ने की काफी कोशिश की, लेकिन नतीजे सिफर रहे और कांग्रेस सिर्फ दो सीटों पर सिमट गई।
इस्तीफे की असली वजह क्या?
राजनीतिक सूत्रों की मानें तो रायबरेली दौरे के दौरान राहुल गांधी के कार्यक्रम में तवज्जो न मिलना इस इस्तीफे की तात्कालिक वजह बनी। सिद्दीकी ने अपने पत्र में खुद को ‘हाशिए’ पर महसूस करने की बात कही है। असल में, कांग्रेस के भीतर इमरान मसूद और इमरान प्रतापगढ़ी जैसे युवा और मुखर मुस्लिम चेहरों के बढ़ते कद ने सिद्दीकी की राहें मुश्किल कर दी थीं।
कांग्रेस को कितना होगा नुकसान?
जानकारों का मानना है कि सिद्दीकी के जाने से कांग्रेस को कोई ‘निर्णायक’ चुनावी झटका नहीं लगेगा। इसकी वजह यह है कि वर्तमान में यूपी का मुस्लिम वोट बैंक अखिलेश यादव के ‘PDA’ (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की ओर ज्यादा झुका हुआ है। कांग्रेस के लिए यह नुकसान संगठनात्मक और मनोवैज्ञानिक अधिक है। अजय राय जैसे नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश जरूर की, लेकिन सिद्दीकी अब नई राह तलाश रहे हैं। फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे वापस बसपा का रुख करते हैं या किसी और पाले में जाकर कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाते हैं।
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