रांची: झारखंड के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में से एक, रांची विश्वविद्यालय (RU) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार मामला कानून की पढ़ाई यानी विधि (Law) शिक्षा से जुड़ा है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर विधि विभाग में निर्देशक (Director) के पद पर किसी अयोग्य व्यक्ति को बैठाने का गंभीर आरोप लगाया है। छात्र संगठन का कहना है कि जिस विभाग से देश के भविष्य के वकील और न्यायाधीश निकलने चाहिए, वहां नियमों को ताक पर रखकर नियुक्तियां की जा रही हैं।

योग्यता पर सवाल : “बिना डिग्री के कैसे मिलेगा ज्ञान?”

NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष अमन अहमद ने इस मुद्दे पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने विधि निर्देशक के पद पर जिस व्यक्ति की नियुक्ति की है, उनके पास इस पद के लिए अनिवार्य शैक्षणिक योग्यताएं तक नहीं हैं। अहमद का दावा है कि वर्तमान निर्देशक के पास न तो विधि विषय की गहरी जानकारी है और न ही उनके पास शोध की सबसे बड़ी डिग्री पीएचडी (PhD) है।

अमन अहमद ने सवाल उठाया कि जब यूजीसी (UGC) के कड़े मापदंड हर पद के लिए शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करते हैं, तो रांची विश्वविद्यालय ने इन नियमों को कैसे अनदेखा कर दिया? यह मामला केवल एक नियुक्ति का नहीं, बल्कि उन हजारों छात्रों के भविष्य का है जो कानून की बारीकियां सीखने के लिए विश्वविद्यालय आते हैं।

भारी फीस और भविष्य से खिलवाड़

NSUI ने इस बात पर भी गहरा असंतोष जताया कि एक ओर जहां शैक्षणिक गुणवत्ता गिर रही है, वहीं दूसरी ओर छात्रों से ‘सेल्फ फाइनेंसिंग’ के नाम पर भारी-भरकम फीस वसूली जा रही है। छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि जब उन्हें योग्य शिक्षक और कुशल निर्देशक ही नहीं मिलेंगे, तो वे इतनी मोटी फीस क्यों चुकाएं?

संगठन का आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस पूरे मामले में केवल ‘खानापूर्ति’ कर रहा है। बार-बार शिकायत के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी अपनी जवाबदेही से बच रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों के भविष्य को दांव पर लगाकर किसी विशेष व्यक्ति को लाभ पहुंचाने की ठान ली है।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की गुहार

मामले की गंभीरता को देखते हुए NSUI ने झारखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री से तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। संगठन ने एक औपचारिक मांग-पत्र सौंपते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर जांच की अपील की है:

  • निर्देशक की नियुक्ति प्रक्रिया की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  • शैक्षणिक योग्यता की कमी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति को तत्काल प्रभाव से पदमुक्त किया जाए।
  • विभाग में किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाए जो विधि विषय में पारंगत हो और जिसके पास आवश्यक डिग्रियां हों।

बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए ‘NSUI’ और विशेषज्ञों के सुझाव

विश्वविद्यालय की साख बचाने और विधि शिक्षा को पटरी पर लाने के लिए प्रशासन को इन सुझावों पर गौर करना चाहिए:

  • पारदर्शी चयन प्रक्रिया: विश्वविद्यालय में किसी भी महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति के समय उम्मीदवारों की शैक्षणिक योग्यता और अनुभव को सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) में रखा जाना चाहिए ताकि कोई संदेह न रहे।

  • BCI के नियमों का कड़ाई से पालन: बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के मानकों के अनुसार लॉ कॉलेजों में शिक्षकों और निदेशकों की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए। बिना पीएचडी या आवश्यक अनुभव के निर्देशक बनाना संस्था की मान्यता को भी खतरे में डाल सकता है।

  • छात्र ऑडिट समिति: फीस और सुविधाओं के बीच संतुलन बनाने के लिए एक छात्र प्रतिनिधि समिति होनी चाहिए, जो सीधे कुलपति को रिपोर्ट करे।

  • नियमित शिकायत निवारण: छात्रों की शिकायतों को केवल कागजों तक सीमित न रखकर उन पर समयबद्ध कार्रवाई (Time-bound Action) सुनिश्चित की जानी चाहिए।

एनएसयूआई की अगली रणनीति : “तालाबंदी और राजभवन मार्च”

अमन अहमद और एनएसयूआई की टीम ने स्पष्ट किया है कि यदि समय रहते संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई, तो संगठन निम्नलिखित कदम उठाएगा:

  • कुलपति कार्यालय का घेराव: छात्र संघ विधि विभाग और प्रशासनिक भवन में तालाबंदी की योजना बना रहा है ताकि कामकाज ठप कर दबाव बनाया जा सके।

  • मशाल जुलूस: छात्रों और अभिभावकों को एकजुट करने के लिए विश्वविद्यालय परिसर से कचहरी चौक तक मशाल जुलूस निकालने की तैयारी है।

  • राजभवन मार्च: राज्यपाल को व्यक्तिगत रूप से ज्ञापन सौंपने और उनके हस्तक्षेप की मांग को लेकर एक विशाल “छात्र आक्रोश मार्च” निकाला जाएगा।

विधि निर्देशक/विभागाध्यक्ष के लिए अनिवार्य कानूनी मापदंड

विधि (Law) शिक्षा भारत में अन्य विषयों से भिन्न है क्योंकि यह सीधे तौर पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा विनियमित होती है। किसी भी विश्वविद्यालय के लॉ विभाग के प्रमुख के लिए निम्नलिखित शैक्षणिक योग्यता (UGC और BCI के अनुसार) अनिवार्य हैं:

  • पीएचडी (Ph.D.) अनिवार्य: यूजीसी रेगुलेशन 2018 के अनुसार, किसी भी विश्वविद्यालय के विभाग में निर्देशक या प्रोफेसर के पद के लिए संबंधित विषय में पीएचडी की डिग्री होना अनिवार्य है। यदि वर्तमान निर्देशक के पास पीएचडी नहीं है, तो यह सीधे तौर पर यूजीसी के नियमों का उल्लंघन है।

  • लॉ में मास्टर डिग्री (LL.M): निर्देशक के पास कम से कम 55% अंकों के साथ कानून में स्नातकोत्तर की डिग्री होनी चाहिए।

  • कोर फैकल्टी नियम: BCI के नियम स्पष्ट करते हैं कि लॉ कॉलेज या विभाग का प्रमुख वही व्यक्ति हो सकता है जिसने स्वयं कानून की पढ़ाई की हो और कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में पर्याप्त अनुभव रखता हो। गैर-कानूनी पृष्ठभूमि के व्यक्ति को लॉ विभाग का ‘अकादमिक निर्देशक’ बनाना BCI की मान्यता को खतरे में डाल सकता है।

  • प्रशासनिक बनाम शैक्षणिक नियुक्ति: विश्वविद्यालय अक्सर तर्क देते हैं कि ‘निर्देशक’ एक प्रशासनिक पद है। लेकिन कानून की शिक्षा में, निर्देशक अक्सर विभागाध्यक्ष (HOD) के समकक्ष होता है। UGC नियम 4.1 के तहत, विभागाध्यक्ष केवल वही बन सकता है जो उस विभाग का वरिष्ठतम प्रोफेसर हो और संबंधित विषय की योग्यता रखता हो।

छात्रों पर प्रभाव (The Risk Factor)

यदि अयोग्य व्यक्ति की नियुक्ति बनी रहती है, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं:

  • डिग्री की वैधता: यदि बीसीआई (BCI) को पता चलता है कि विभाग का संचालन नियमों के विरुद्ध हो रहा है, तो वह छात्रों की डिग्री को ‘प्रोफेशनल प्रैक्टिस’ के लिए अयोग्य घोषित कर सकता है।
  • नामांकन पर रोक: भविष्य में रांची विश्वविद्यालय के लॉ विभाग में नए नामांकन पर BCI द्वारा रोक लगाई जा सकती है।
  • शैक्षणिक गुणवत्ता: बिना पीएचडी और कानूनी समझ के निर्देशक, शोध (Research) और पाठ्यक्रम (Curriculum) के विकास में कोई योगदान नहीं दे पाएगा।
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