रांची: झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधारों के उद्देश्य से लाया गया ‘झारखंड राज्य विश्वविद्यालय विधेयक 2026’ मंगलवार को विधानसभा के बजट सत्र में पारित हो गया। सदन की दूसरी पाली में गहन चर्चा और सत्ता पक्ष-विपक्ष की तीखी बहस के बीच इस महत्वपूर्ण विधेयक पर मुहर लगी। दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने पिछले साल (2025) पेश किए गए पुराने विधेयक को वापस ले लिया और उसमें जरूरी संशोधनों के साथ नए स्वरूप में इसे पेश किया।

छात्रों के लिए बड़ी राहत : रिजल्ट का ‘डेडलाइन’ तय

इस विधेयक की सबसे बड़ी उपलब्धि छात्रों के लिए ‘रिजल्ट’ का इंतजार खत्म करना है। सदन में विधेयक का पक्ष रखते हुए मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने घोषणा की कि अब विश्वविद्यालयों को परीक्षा के बाद 30 दिनों के भीतर परिणाम (Results) जारी करने होंगे। किसी भी विशेष परिस्थिति में यह सीमा अधिकतम 45 दिनों से ज्यादा नहीं होगी। यह कदम छात्रों के शैक्षणिक सत्र को नियमित करने और उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उठाया गया है।

अब कैंपस में ही आएगा रोजगार, रुकेगा पलायन

विधेयक में छात्रों के रोजगार (Placement) पर विशेष फोकस किया गया है। नए नियमों के तहत अब विश्वविद्यालयों में प्लेसमेंट कंपनियों के लिए अलग कार्यालय की व्यवस्था होगी। चर्चा के दौरान भाजपा विधायक राज सिन्हा ने सुझाव दिया कि युवाओं को रोजगार के लिए बाहर न भटकना पड़े, इसके लिए कैंपस प्लेसमेंट को अनिवार्य जैसा बनाया जाए। सरकार ने इसे स्वीकारते हुए स्थानीय स्तर पर बेहतर अवसर प्रदान करने का भरोसा दिया।

कुलपति चयन और प्रशासनिक बदलाव

विधेयक में विश्वविद्यालय प्रशासन को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए ‘झारखंड विश्वविद्यालय सेवा आयोग’ में अखिल भारतीय सेवा (IAS) के अधिकारियों को शामिल करने का प्रावधान है। वहीं, कुलपति (VC) के चयन को लेकर विपक्षी सदस्यों ने स्वायत्तता पर सवाल उठाए। इस पर मंत्री सुदिव्य सोनू ने स्पष्ट किया कि राज्य के दो संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल और मुख्यमंत्री की समिति ही राज्यहित में सर्वश्रेष्ठ निर्णय लेगी।

सीनेट की बैठकें और विपक्ष की आपत्ति

सदन में चर्चा के दौरान भाजपा विधायक राज सिन्हा और अमित यादव ने विधेयक को प्रवर समिति (Select Committee) के पास भेजने की मांग की थी। राज सिन्हा ने दलील दी कि 135 पन्नों के इस विस्तृत विधेयक को पढ़ने का पर्याप्त समय नहीं मिला। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 2017 के बाद से कई विश्वविद्यालयों में सीनेट की बैठकें ही नहीं हुई हैं। सरकार ने आश्वासन दिया कि नए कानून के तहत साल में कम से कम दो बार सीनेट की बैठक अनिवार्य होगी।

इस ऐतिहासिक विधेयक के पारित होने के साथ ही विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो ने सदन की कार्यवाही को 18 मार्च सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया।

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