Chennai: तमिलनाडु की सियासत में इस वक्त जबरदस्त उथल-पुथल मची हुई है। अभिनेता से नेता बने थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) 108 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े (118) से अब भी दूर है। इसी बीच, सत्ताधारी डीएमके (DMK) ने एक ऐसा सियासी दांव चला है जिसने सबको हैरान कर दिया है। डीएमके ने थलापति विजय को बाहर से समर्थन देने के संकेत दिए हैं, जिसे राजनीति के जानकार ‘एक तीर से दो शिकार’ मान रहे हैं।
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स्टालिन का मास्टरस्ट्रोक और ‘रिजॉल्यूशन 3’
7 मई को हुई डीएमके विधायक दल की बैठक में पारित किए गए ‘प्रस्ताव संख्या 3’ ने नए समीकरणों को जन्म दे दिया है। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि राज्य की जटिल राजनीतिक स्थिति को देखते हुए पार्टी अध्यक्ष एमके स्टालिन को सभी जरूरी फैसले लेने का अधिकार दिया जाता है। प्रस्ताव में स्पष्ट उल्लेख है कि तमिलनाडु की जनता एक और चुनाव का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं है, इसलिए एक स्थिर सरकार का गठन अनिवार्य है। यह सीधे तौर पर टीवीके को समर्थन देकर नई सरकार बनवाने की ओर इशारा है।
एक तीर से दो शिकार: रणनीति के पीछे का गणित
डीएमके की इस नई रणनीति के पीछे दो बड़े उद्देश्य नजर आ रहे हैं:
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लोकप्रियता और पकड़: थलापति विजय की प्रचंड लोकप्रियता और उनकी पार्टी की सबसे ज्यादा सीटों को देखते हुए, स्टालिन बाहर से समर्थन देकर जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहते हैं। इससे डीएमके सरकार का हिस्सा बने बिना अपने ‘द्रविड़ मॉडल’ और जनकल्याणकारी योजनाओं को सुरक्षित रख सकेगी।
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भाजपा की ‘नो एंट्री’: डीएमके का यह कदम सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से दूर रखने और भाजपा की किसी भी संभावित ‘बैकडोर एंट्री’ को रोकने की एक बड़ी कवायद है।
कांग्रेस से बढ़ी दूरियां
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। डीएमके ने गठबंधन में ईमानदारी की कमी का हवाला देते हुए अपने पुराने सहयोगी (कांग्रेस) के प्रति कड़े तेवर दिखाए हैं। कांग्रेस ने पहले ही टीवीके को समर्थन देने के संकेत दिए थे, लेकिन डीएमके के इस दांव ने उसे भी सोचने पर मजबूर कर दिया है।
वर्तमान स्थिति में एमके स्टालिन ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाते दिख रहे हैं। अब देखना यह होगा कि स्टालिन का यह नया राजनीतिक मॉडल तमिलनाडु को कितनी स्थिरता प्रदान करता है और थलापति विजय इस समर्थन को किस तरह स्वीकार करते हैं।
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