Kolkota: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक दशक से अधिक समय तक एकछत्र राज करने वाली ममता बनर्जी के राजनीतिक सफर में यह अब तक का सबसे कठिन दौर साबित हो रहा है। 15 साल तक सत्ता की बागडोर संभालने के बाद न सिर्फ दीदी की सरकार चली गई, बल्कि अपने ही गढ़ भवानीपुर में शुभेंदु अधिकारी के हाथों मिली हार ने उनके चमकदार करियर पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। पांच साल पहले नंदीग्राम में मात खाने के बाद इस बार अपनी परंपरागत सीट खोना ममता के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
भवानीपुर में पलटा चुनावी ‘खेला’
इस मुकाबले का उतार-चढ़ाव कोलकाता के किसी रोमांचक फुटबॉल मैच जैसा रहा। शुरुआती राउंड में शुभेंदु आगे रहे, लेकिन तीसरे राउंड के बाद ममता ने बढ़त बनाई और सातवें राउंड तक वे 17 हजार वोटों से आगे थीं। उस वक्त लगा कि ममता अपनी सीट बचा लेंगी, लेकिन इसके बाद ‘खेला’ पूरी तरह पलट गया। जैसे-जैसे शुभेंदु के प्रभाव वाले क्षेत्रों की ईवीएम खुलीं, ममता की बढ़त कम होती गई। 16वें राउंड में शुभेंदु ने पहली बार बढ़त बनाई और अंत तक उसे जीत में तब्दील कर दिया।
काउंटिंग सेंटर पर डटी रहीं ममता
नतीजों के दिन ममता बनर्जी खुद साखावत मेमोरियल हाई स्कूल स्थित काउंटिंग सेंटर में पांच घंटे से अधिक समय तक डटी रहीं। जैसे-जैसे राउंड बढ़े, धड़कनें तेज होती गईं। 18वें राउंड के बाद जब वे करीब 11 हजार वोटों से पिछड़ गईं, तो वे केंद्र से बाहर निकल गईं। अंततः शुभेंदु अधिकारी ने 15,105 मतों के अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की। बाहर निकलते समय ममता ने बदसलूकी और शारीरिक हमले तक के गंभीर आरोप लगाए।
भाजपा की बड़ी जीत और नए युग का संकेत
राज्य में सत्ता विरोधी लहर, धार्मिक ध्रुवीकरण और जमीनी स्तर पर भाजपा की घेराबंदी ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को महज 80 सीटों पर समेट दिया। वहीं भाजपा ने 200 का आंकड़ा पार कर सबको हैरान कर दिया है। मतदान के दिन से ही ममता बनर्जी के चेहरे पर चिंता साफ देखी जा सकती थी। भवानीपुर के बूथों पर उनकी भागदौड़ ने पहले ही इशारा कर दिया था कि वे राजनीतिक चक्रव्यूह में फंस चुकी हैं। बंगाल की राजनीति का यह परिणाम एक नए युग की शुरुआत का संकेत दे रहा है।
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