Washington (USA): अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापारिक संबंधों में उस वक्त हड़कंप मच गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति का चाबुक दक्षिण कोरिया पर चला दिया। ट्रम्प ने दक्षिण कोरिया से आने वाले सामानों पर आयात शुल्क (टैरिफ) को 15 प्रतिशत से बढ़ाकर सीधे 25 प्रतिशत करने का सनसनीखेज एलान किया है। यह फैसला इसलिए हैरान करने वाला है क्योंकि अभी कुछ ही महीने पहले दोनों देशों ने एक ऐतिहासिक फ्री ट्रेड समझौते पर हाथ मिलाया था।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस कड़े कदम के पीछे दक्षिण कोरियाई संसद को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि कोरियाई संसद ने उस व्यापारिक समझौते को अब तक कानूनी अमलीजामा नहीं पहनाया है, जिस पर दोनों देशों के प्रमुखों ने सहमति जताई थी। ट्रम्प ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक अमेरिका में आने वाली दक्षिण कोरियाई गाड़ियां (Automobiles), लकड़ी और दवाइयों (Pharmaceuticals) पर 25 प्रतिशत का भारी-भरकम टैक्स वसूला जाएगा।

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गौरतलब है कि जुलाई में हुए समझौते के दौरान यह दावा किया गया था कि दक्षिण कोरिया अमेरिका में 350 अरब डॉलर का निवेश करेगा और बदले में अमेरिका टैरिफ को कम रखेगा। लेकिन ट्रम्प के इस ताज़ा यू-टर्न ने अमेरिका के वादों की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। दक्षिण कोरिया हर साल अमेरिका को करीब 150 अरब डॉलर का सामान निर्यात करता है, ऐसे में 10% की यह अतिरिक्त वृद्धि कोरियाई अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकती है।

हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों का तर्क कुछ और ही है। शोध बताते हैं कि इन टैरिफ का बोझ अंततः अमेरिकी जनता को ही उठाना पड़ता है, क्योंकि आयात शुल्क बढ़ने से घरेलू बाजार में चीजें महंगी हो जाती हैं। कनाडा और यूरोपीय देशों के बाद अब कोरिया के साथ हुई इस तकरार ने वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता पैदा कर दी है। फिलहाल सबकी नजरें अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहाँ राष्ट्रपति के इन व्यापक व्यापारिक अधिकारों की वैधता को चुनौती दी गई है। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि ट्रम्प की यह ‘टैरिफ गन’ कितनी दूर तक जाएगी।

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