Ranchi : राजधानी रांची में शनिवार सुबह पुलिस की एक तथाकथित बड़ी सफलता ने जबरदस्त सुर्खियां बटोरीं, लेकिन अगले ही दिन यह मामला पुलिस के लिए गहरी शर्मिंदगी का कारण बन गया। सुखदेवनगर थाना क्षेत्र के न्यू मार्केट बस स्टैंड में की गई छापेमारी में पुलिस ने यह दावा किया था कि बस से लगभग 2 करोड़ रुपये के नकली नोट बरामद किए गए हैं। गिरफ्तारी भी की गई और पूरे घटनाक्रम को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया के सामने उपलब्धि की तरह पेश किया गया। लेकिन जांच आगे बढ़ने पर सच्चाई ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
दरअसल, बरामद किए गए नोट वे खतरनाक नकली नोट नहीं थे जिनकी तस्करी का अंदेशा जताया गया था, बल्कि वे बच्चों के खेल में इस्तेमाल किए जाने वाले खिलौना नोट निकले। इतनी गंभीर चूक ने न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए, बल्कि लोगों के मन में यह धारणा भी बन गई कि क्या पुलिस बिना ठोस सबूतों के किसी को भी अपराधी ठहराने लगी है।
सूत्रों के मुताबिक एसएसपी चंदन सिन्हा को गुप्त सूचना मिली थी कि पटना से रांची नकली नोटों की बड़ी खेप लाई जा रही है। इस सूचना पर कोतवाली डीएसपी प्रकाश सोए की अगुवाई में एक विशेष टीम गठित हुई और बस स्टैंड पर घेराबंदी कर दी गई। बस में रखे एक बक्से से नोटों की बरामदगी हुई और तुरंत दो लोगों को हिरासत में ले लिया गया। पुलिस ने इस कार्रवाई को अपनी बड़ी उपलब्धि करार दिया और आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर मीडिया के सामने नकली नोटों का खुलासा कर दिया।
लेकिन, दूसरे ही दिन जब अनुसंधान की गहराई में मामला गया तो पूरी हकीकत सामने आई। नोट असली या उच्च स्तरीय नकली नहीं, बल्कि बिल्कुल नकली यानी बच्चों के खेलने वाले साबित हुए। इस खुलासे के बाद पुलिस की तत्परता की बजाय उसकी लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी चर्चा का विषय बन गई।
जनता के बीच अब यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या रांची पुलिस बिना उचित जांच और पुष्टि के केवल दिखावा करने के लिए कार्रवाई करती है? क्या पुलिस महकमे के अधिकारी केवल सुर्खियां बटोरने के लिए इतनी बड़ी गलती कर सकते हैं? स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले दिन पुलिसिया कार्रवाई के बाद जिस तरह से अधिकारियों ने अपनी पीठ थपथपाई और मीडिया के सामने इसे अभूतपूर्व उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया, वही अगले दिन उनके लिए गहरी शर्मिंदगी का कारण बन गया।
डीएसपी प्रकाश सोए स्वयं उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थे और दावा कर रहे थे कि 2 करोड़ रुपये के नकली नोट बरामद किए गए हैं। अब सवाल यह भी उठता है कि क्या थाना स्तर के अधिकारी ने यह निर्णय अकेले लिया या फिर वरिष्ठ अधिकारियों की सहमति से यह प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई थी। यदि यह उच्च अधिकारियों की मंजूरी से हुआ तो फिर इस मामले में जिम्मेदारी पूरे पुलिस तंत्र की बनती है।
फिलहाल यह घटना पुलिस की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाती नजर आ रही है। जनता अब इस बात पर सोचने को मजबूर है कि यदि पुलिस इस तरह की जल्दबाजी में गलत निष्कर्ष पर पहुंच सकती है, तो आम नागरिकों की सुरक्षा और न्याय की गारंटी कैसे होगी। रांची पुलिस की यह चूक केवल एक गलती नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान है।



