Haldwani: एक तरफ नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) युवाओं को किताबी ज्ञान के साथ-साथ कौशल परक (Skill-based) शिक्षा देने का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं उत्तराखंड में हकीकत इसके ठीक उलट नजर आ रही है। प्रदेश के 200 सरकारी स्कूलों में संचालित हो रहे प्रोफेशनल कोर्स एक अप्रैल से अचानक बंद कर दिए गए हैं। इस फैसले ने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट के उन 21,850 विद्यार्थियों के भविष्य पर संकट खड़ा कर दिया है, जिन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी (IT), पर्यटन और ब्यूटी-वेलनेस जैसे विषयों को अपने करियर के रूप में चुना था।
आंकड़ों में बढ़ता रुझान, हकीकत में सन्नाटा
उत्तराखंड बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, प्रोफेशनल कोर्स की ओर बच्चों का रुझान तेजी से बढ़ा है। पिछले साल जहां 16,961 छात्रों ने इन विषयों को चुना था, वहीं इस साल यह संख्या बढ़कर 21,850 पहुंच गई। लेकिन विडंबना देखिए कि जब बच्चों ने पढ़ाई का मन बनाया, तब सिस्टम ने पाठ्यक्रमों पर ही रोक लगा दी। अब आलम यह है कि 10वीं और 12वीं के छात्रों के पास विषय तो हैं, लेकिन उन्हें पढ़ाने के लिए स्कूलों में कोई शिक्षक मौजूद नहीं है।
क्यों बंद हुए कोर्स?
समग्र शिक्षा योजना के तहत इन कोर्सों के संचालन के लिए नोएडा की एक निजी कंपनी ‘विजन इंडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड’ के साथ पांच साल का अनुबंध किया गया था। इस अनुबंध के तहत 200 स्कूलों में 255 व्यावसायिक शिक्षा लैब और 28 स्पोक विद्यालयों में कक्षाएं चल रही थीं। समग्र शिक्षा राज्य परियोजना निदेशक ने 31 मार्च को पत्र जारी कर अनुबंध खत्म होने का हवाला देते हुए कोर्सों के संचालन पर रोक लगा दी।
शिक्षक संघ और सिस्टम के बीच तकरार
राजकीय शिक्षक संघ ने इस फैसले को बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करार दिया है। कुमाऊं मंडल अध्यक्ष डॉ. रविशंकर गुसाईं ने सवाल उठाया कि जिस राज्य में एनईपी लागू करने पर जोर दिया जा रहा है, वहां कौशल शिक्षा को बंद करना तर्कहीन है। दूसरी ओर, माध्यमिक शिक्षा निदेशक डॉ. मुकुल सती का कहना है कि अनुबंध पूरा होने के कारण फिलहाल शिक्षण स्थगित हुआ है और जल्द ही नई व्यवस्था बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
अधर में लटका भविष्य
फिलहाल, जिम्मेदार अधिकारियों के पास इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं है कि कक्षाएं दोबारा कब शुरू होंगी। सत्र शुरू हो चुका है और बोर्ड परीक्षाओं का दबाव बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या सिस्टम की इस सुस्ती का खामियाजा उन हजारों बच्चों को भुगतना पड़ेगा जो रोजगारपरक शिक्षा के सपने देख रहे थे?
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