Jamshedpur News: सोमवार को करनडीह में आयोजित ओलचिकी लिपि शताब्दी समारोह के अवसर पर भावनात्मक माहौल देखने को मिला। इस दौरान भाजपा नेता एवं ऑल इंडिया संथाली फिल्म संगठन के अध्यक्ष रमेश हांसदा ने इसे संथाल समाज के लिए गर्व और सम्मान का ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि करनडीह की यह धरती पंडित रघुनाथ मुर्मू की कर्मस्थली रही है, जहां से ओलचिकी लिपि के लिए संघर्ष की शुरुआत हुई थी। ऐसे पावन स्थल पर महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का आगमन पूरे समाज के लिए गौरवशाली और यादगार पल है।

ओलचिकी लिपि शताब्दी समारोह बना ऐतिहासिक क्षण, करनडीह की धरती पर राष्ट्रपति का आगमन गौरवपूर्ण : रमेश हांसदा

पंडित रघुनाथ मुर्मू की कर्मस्थली को मिला सम्मान

रमेश हांसदा ने कहा कि ओलचिकी लिपि केवल एक लिपि नहीं, बल्कि संथाल समाज की पहचान, संस्कृति और अस्मिता का प्रतीक है। शताब्दी समारोह के माध्यम से न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया में ओलचिकी लिपि के महत्व को नई पहचान मिलेगी। उन्होंने कहा कि आज पूरा समाज इस ऐतिहासिक क्षण को गर्व के साथ महसूस कर रहा है और उत्सव का आनंद ले रहा है।

संघर्ष की विरासत और पारिवारिक गौरव

उन्होंने पंडित रघुनाथ मुर्मू के संघर्षों को याद करते हुए कहा कि ओलचिकी लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने नाटकों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और जनसंपर्क के विभिन्न माध्यमों का सहारा लिया। यह एक लंबा और कठिन संघर्ष था, जिसमें समाज के कई लोगों ने सहयोग किया। रमेश हांसदा ने गर्व के साथ बताया कि उनके ससुर भी पंडित रघुनाथ मुर्मू के संघर्ष के शुरुआती सहयोगियों में शामिल रहे, जिसे वे अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।

शिक्षा प्रणाली में ओलचिकी को अनिवार्य करने की मांग

रमेश हांसदा ने हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा देश को संथाली भाषा में संबोधित किए जाने को भी ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षण संथाल समाज के आत्मसम्मान को और मजबूत करता है तथा आने वाली पीढ़ियों को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने की प्रेरणा देता है।

उन्होंने राज्य और केंद्र सरकार से आग्रह किया कि ओलचिकी लिपि को और सशक्त बनाने के लिए प्राथमिक शिक्षा में इसे अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। विशेष रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में कक्षा एक से पांच तक ओलचिकी लिपि में पढ़ाई कराई जाए, ताकि बचपन से ही बच्चों में अपनी मातृभाषा और लिपि के प्रति जागरूकता और गर्व विकसित हो सके। रमेश हांसदा ने विश्वास जताया कि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाने से ओलचिकी लिपि का संरक्षण और विकास और अधिक मजबूती के साथ आगे बढ़ेगा।

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