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रांची: झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर विवादों के घेरे में है। ताजा मामला रांची विश्वविद्यालय (RU) द्वारा निकाले गए सहायक प्राध्यापकों (Assistant Professors) के भर्ती विज्ञापन से जुड़ा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने ‘सेल्फ-फाइनेंस वोकेशनल कोर्स’ के तहत MBA और BBA विषयों के लिए संविदा के आधार पर आवेदन मांगे हैं, लेकिन इस प्रक्रिया के सार्वजनिक होते ही झारखंड NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष अमन अहमद ने इस पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे तत्काल रोकने की मांग की है।
क्या है विश्वविद्यालय का विज्ञापन?
रांची विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञापन के अनुसार, कुल 6 पदों पर 11 महीने के अनुबंध (Contract) पर सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति की जानी है। इनमें MBA (HR-2, Finance-2, IT-1) और BBA (Finance-1) के पद शामिल हैं। आवेदन की प्रक्रिया 24 अप्रैल 2026 से शुरू होकर 20 मई 2026 तक चलेगी। इसके लिए सामान्य और ओबीसी वर्ग के लिए 1500 रुपये तथा अनुसूचित जाति/जनजाति और ईडब्ल्यूएस के लिए 1000 रुपये का भारी-भरकम आवेदन शुल्क भी रखा गया है।
अमन अहमद की चेतावनी: ‘हाईकोर्ट के आदेश की अवमानना’
NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष अमन अहमद ने इस नियुक्ति प्रक्रिया को युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया है। उन्होंने तर्क दिया कि झारखंड उच्च न्यायालय ने पूर्व में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और स्थिरता बनाए रखने के लिए संविदा के बजाय स्थायी नियुक्तियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

अमन अहमद का कहना है, “एक तरफ राज्य के युवा वर्षों से स्थायी नौकरी का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन 11 महीने के ‘अल्पकालिक अनुबंध’ पर शिक्षकों को रखकर शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता कर रहा है। यह न केवल न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन है, बल्कि उन मेधावी छात्रों का अपमान भी है जो यूजीसी नेट और पीएचडी जैसी कठिन अहर्ताएं पूरी कर स्थायी रोजगार की तलाश में हैं।”
शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों का भविष्य दांव पर
छात्र संगठनों का मानना है कि संविदा पर होने वाली नियुक्तियां केवल एक ‘स्टॉप-गैप’ व्यवस्था है। जब शिक्षकों को अपनी नौकरी की सुरक्षा का पता नहीं होता, तो वे पूरे मनोयोग से शिक्षण कार्य नहीं कर पाते। अमन अहमद ने मांग की है कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस विज्ञापन को तत्काल वापस ले और रिक्त पदों पर स्थायी बहाली की प्रक्रिया शुरू करे। उन्होंने राज्य सरकार से भी हस्तक्षेप की अपील की है ताकि झारखंड के विश्वविद्यालय केवल ‘ठेका प्रथा’ के केंद्र बनकर न रह जाएं।
विवादों के बीच आवेदन प्रक्रिया
विज्ञापन के अनुसार, चयन यूजीसी के नियमों और राज्य सरकार की रोस्टर पॉलिसी के तहत होगा। लेकिन 1500 रुपये के आवेदन शुल्क और केवल 11 महीने की नौकरी ने अभ्यर्थियों के बीच भी नाराजगी पैदा कर दी है। कई अभ्यर्थियों का कहना है कि इतने कम समय की नौकरी के लिए इतना अधिक शुल्क वसूलना अनुचित है।
अब देखना यह होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्र संगठन की इस मांग पर क्या रुख अपनाता है। क्या कुलपति महोदया हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए इस संविदा बहाली को रद्द कर स्थायी नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त करेंगी, या फिर विवाद और बढ़ेगा?

