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Mumbai: महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है’ वाली कहावत सच साबित होती दिख रही है। राज्य स्तर पर एक-दूसरे के वजूद को चुनौती देने वाले मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के गुटों ने सोलापुर जिले में हाथ मिला लिया है। सोलापुर के बार्शी तालुका में जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों के लिए यह अप्रत्याशित गठबंधन हुआ है, जिसका एकमात्र मकसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बढ़ते वर्चस्व को रोकना है।
बार्शी में बना ‘अनोखा’ मोर्चा
बार्शी के कद्दावर नेता और विधायक दिलीप सोपाल के नेतृत्व में यह गठबंधन तैयार हुआ है। हैरानी की बात यह है कि इसमें सिर्फ शिवसेना के दोनों गुट ही नहीं, बल्कि अजित पवार की एनसीपी और शरद पवार की राकंपा (एसपी) भी शामिल हैं। सीट बंटवारे पर हुए समझौते के मुताबिक, एनसीपी को सबसे ज्यादा सीटें दी गई हैं, जबकि शिंदे गुट को 2 और उद्धव गुट को 1 जिला परिषद सीट मिली है। स्थानीय स्तर पर भाजपा की मजबूती को देखते हुए इन सभी दलों ने अपने मतभेदों को किनारे रख दिया है।
पार्टी नेतृत्व भी हैरान
इस गठबंधन की खबर जैसे ही राज्य की राजनीति में फैली, बड़े नेताओं के बयान आने शुरू हो गए। शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने साफ किया कि स्थानीय स्तर पर हुए इस तालमेल की जानकारी शीर्ष नेतृत्व को पूरी तरह से नहीं थी और इस पर विवरण जुटाया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि उद्धव ठाकरे भी इस फैसले से पूरी तरह अवगत नहीं थे।
क्या बदलेगा समीकरण?
सोलापुर हमेशा से भाजपा का गढ़ रहा है और हालिया चुनावों में पार्टी ने यहाँ शानदार प्रदर्शन किया है। अब जब शिंदे और उद्धव गुट के कार्यकर्ता एक साथ वोट मांगेंगे, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस ‘खिचड़ी गठबंधन’ को कैसे स्वीकार करते हैं। क्या यह प्रयोग केवल एक जिले तक सीमित रहेगा या भविष्य में राज्य की बड़ी राजनीति में भी कोई नया संकेत देगा, यह चुनाव परिणामों के बाद ही साफ होगा।



