New Delhi : इतिहास के पन्नों में 23 अगस्त की तारीख एक खास वजह से हमेशा याद की जाएगी। वर्ष 2007 में भारत की प्राचीन धरोहर ऋग्वेद की 30 पांडुलिपियां यूनेस्को के ‘विश्व स्मृति रजिस्टर’ (Memory of the World Register) में शामिल की गईं। यह फैसला न सिर्फ भारतीय संस्कृति के लिए गौरव का क्षण था, बल्कि वैश्विक स्तर पर वैदिक परंपरा की महत्ता को भी स्थापित करने वाला साबित हुआ।

ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। इसमें वेदिक मंत्र, स्तोत्र और प्राचीन ज्ञान का भंडार मौजूद है। इसे मानव सभ्यता के शुरुआती वैचारिक और आध्यात्मिक विकास की धरोहर के रूप में देखा जाता है। जब इसकी पांडुलिपियों को यूनेस्को की सूची में स्थान मिला तो यह संदेश पूरी दुनिया को गया कि भारत की सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी और प्राचीन हैं।

यूनेस्को का विश्व स्मृति रजिस्टर उन पांडुलिपियों, दस्तावेजों और अभिलेखों को संरक्षित करने का मंच है, जो मानव इतिहास और सभ्यता के विकास में अत्यधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऋग्वेद का इसमें शामिल होना भारतीय विद्या और परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।

आज यह घटना हमें याद दिलाती है कि हमारी धरोहरें सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व की साझी पूंजी हैं। ऋग्वेद का यह सम्मान भारतीय संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान देता है।

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