World News: आर्कटिक क्षेत्र में स्थित ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हलचल तेज हो गई है। किसी भी बाहरी खतरे से ग्रीनलैंड की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नाटो देशों ने अपनी सैन्य सक्रियता बढ़ा दी है। डेनमार्क की अपील के बाद अब तक छह नाटो देशों ने वहां अपने सैनिक या सैन्य कर्मी भेजने का फैसला किया है।
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ग्रीनलैंड, ग्रीनलैंड का स्वायत्त क्षेत्र है, लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति और रणनीतिक महत्व के कारण यह लंबे समय से वैश्विक राजनीति का केंद्र बना हुआ है।
ट्रंप के बयान से क्यों बढ़ा तनाव
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हुए उस पर कब्जे की बात कही थी। ट्रंप का दावा है कि रूस और चीन ग्रीनलैंड का रणनीतिक इस्तेमाल कर सकते हैं, जिससे पश्चिमी देशों की सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
इन बयानों के बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड प्रशासन ने अपने सहयोगी देशों से संपर्क कर क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की पहल की।
नाटो देशों की बढ़ती सैन्य मौजूदगी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सबसे पहले स्वीडन ने ग्रीनलैंड में सैनिक भेजने की घोषणा की। स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने बताया कि यह कदम डेनमार्क के अनुरोध पर उठाया गया है और यह डेनमार्क के सैन्य अभ्यास ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ का हिस्सा है।
इसके बाद नॉर्वे ने भी दो सैन्य कर्मियों को ग्रीनलैंड भेजने की पुष्टि की। नॉर्वे के रक्षा मंत्री टोरे सैंडविक ने कहा कि नाटो देश आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर लगातार विचार-विमर्श कर रहे हैं।
जर्मनी और फ्रांस भी हुए शामिल
जर्मनी ने भी डेनमार्क के अनुरोध पर 13 सैनिकों को एक टोही मिशन के तहत ग्रीनलैंड भेजने का फैसला किया है। इस मिशन का उद्देश्य क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति का आकलन करना और समुद्री निगरानी की संभावनाओं पर विचार करना है। वहीं फ्रांस ने भी अपने सैन्य कर्मियों को संयुक्त अभ्यास के लिए ग्रीनलैंड भेजा है। नीदरलैंड्स और कनाडा भी इस सैन्य सहयोग में शामिल हैं।
नाटो की स्पष्ट नीति
हालांकि ट्रंप लगातार नाटो से अमेरिका की मदद करने की बात कहते रहे हैं, लेकिन नाटो के सदस्य देशों ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और नाटो के नियमों के तहत सदस्य देश एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य कार्रवाई नहीं कर सकते।
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