World News: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में आज एक ऐसी घोषणा हुई है जिसने दशकों पुराने रक्षा समझौतों की नींव हिला दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खनिज संपदा से भरपूर और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने के लिए अपने इरादे साफ कर दिए हैं। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड का अधिग्रहण अब अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक अनिवार्य लक्ष्य बन चुका है। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार अमेरिका अपने प्रस्ताव के पीछे कूटनीति नहीं, बल्कि ‘सैन्य विकल्प’ की मेज पर सजी तलवार दिखा रहा है।
सैन्य विकल्प या रणनीतिक दबाव?
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने सांसदों को आश्वस्त करने की कोशिश की है कि ‘सैन्य विकल्प’ का अर्थ तुरंत आक्रमण नहीं है, लेकिन व्हाइट हाउस के तीखे तेवर कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। ट्रंप प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी स्टीफन मिलर ने तो यहाँ तक कह दिया कि दुनिया का कोई भी देश इस मुद्दे पर अमेरिका से सैन्य मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है। अमेरिका का तर्क है कि रूस और चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए ग्रीनलैंड पर पूर्ण अमेरिकी नियंत्रण जरूरी है।
डेनमार्क और नाटो की ‘लक्ष्मण रेखा’
ट्रंप की इस जिद ने अमेरिका के सबसे पुराने सहयोगियों को दुश्मन की कतार में खड़ा होने पर मजबूर कर दिया है। डेनमार्क, जिसके अधीन ग्रीनलैंड एक स्वशासित क्षेत्र है, उसने दो टूक कहा है कि “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है।” डेनमार्क के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने सैन्य बल का उपयोग किया, तो यह नाटो (NATO) के अनुच्छेद 5 का सीधा उल्लंघन होगा। नियम के मुताबिक, एक नाटो सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका अपने ही गठबंधन के खिलाफ युद्ध छेड़ेगा?
यूरोप का साझा मोर्चा और वैश्विक आक्रोश
ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और पोलैंड जैसे यूरोपीय दिग्गजों ने एक सुर में डेनमार्क की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन किया है। ग्रीनलैंड की प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक निल्सन ने स्पष्ट किया है कि द्वीप के भविष्य का फैसला केवल वहां के 57,000 निवासी ही करेंगे, न कि वॉशिंगटन का कोई आदेश। पड़ोसी देश कनाडा ने भी इसे संप्रभुता का हनन बताया है।
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वर्तमान में अमेरिका की ग्रीनलैंड के पिटुफिक स्पेस बेस पर सीमित उपस्थिति है, लेकिन ‘पूर्ण कब्जे’ की यह जिद द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से कायम ट्रांसअटलांटिक सुरक्षा संबंधों को जड़ से खत्म करने की क्षमता रखती है। ट्रंप की यह ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति अब ‘अमेरिका अलोन’ (अमेरिका अकेला) की ओर बढ़ती दिख रही है।



