रांची। झारखंड में हाल के दिनों में सामने आई मधुपुर की घटना और देश के वरिष्ठ आदिवासी नेता कड़िया मुंडा को मिली धमकी ने राज्य की कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन घटनाओं को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। आदिवासी समाज और विपक्षी दलों का आरोप है कि राज्य में अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और सरकार स्थिति को नियंत्रित करने में विफल साबित हो रही है।

मधुपुर की घटना को लेकर आरोप है कि वहां एक विशेष वर्ग को खुश करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर ढिलाई बरती गई। इस घटना ने न सिर्फ स्थानीय लोगों की भावनाओं को आहत किया, बल्कि सामाजिक तनाव को भी बढ़ा दिया। विरोध करने वालों का कहना है कि सरकार की कथित तुष्टिकरण नीति के कारण कानून का राज कमजोर पड़ रहा है और आम लोगों का भरोसा प्रशासन से उठता जा रहा है।

इसी बीच झारखंड की राजनीतिक और सामाजिक धरोहर माने जाने वाले लोकसभा के पूर्व उपाअध्यक्ष कड़िया मुंडा को अपराधियों द्वारा धमकी दिए जाने की खबर ने सभी को चौंका दिया। आदिवासी समाज में कड़िया मुंडा का विशेष सम्मान है और उन्हें संविधान, लोकतंत्र और आदिवासी अधिकारों की मजबूत आवाज के रूप में जाना जाता है। ऐसे में उन्हें धमकी मिलना न केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का मामला है, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा विषय बन गया है।

राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने इसे सरकार की विफलता बताते हुए कहा है कि जब इतने वरिष्ठ और प्रतिष्ठित नेता सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिकों की सुरक्षा की कल्पना करना मुश्किल है। विपक्ष ने मांग की है कि धमकी देने वालों की तत्काल पहचान कर सख्त कार्रवाई की जाए और मधुपुर की घटना की निष्पक्ष जांच हो।

आदिवासी संगठनों का कहना है कि जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर आवाज उठाने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। इससे समाज में डर का माहौल पैदा हो रहा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो राज्यभर में आंदोलन तेज किया जाएगा।

सरकार की ओर से हालांकि यह कहा गया है कि कानून-व्यवस्था को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। लेकिन मधुपुर की घटना और कड़िया मुंडा को मिली धमकी ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में भरोसे की बहाली के लिए केवल बयान नहीं, बल्कि ठोस और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।

Share.
Exit mobile version