रांची: झारखंड की राजधानी रांची के चेरी-मनातु स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड (CUJ) में मंगलवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की टीम ने अचानक दबिश दी। आधा दर्जन से अधिक वाहनों में पहुंची CBI की इस टीम ने विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश करते ही हड़कंप मचा दिया। जिस समय टीम पहुंची, उस दौरान कई विभागों में कक्षाएं चल रही थीं, लेकिन जांच के चलते प्रशासनिक कार्यों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।

पुरानी गड़बड़ियों की फिर से खुली फाइलें

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, CBI की यह कार्रवाई विश्वविद्यालय में वर्षों पुरानी कथित वित्तीय अनियमितताओं और नियुक्ति प्रक्रियाओं में हुई गड़बड़ियों से जुड़ी है। जांच टीम का मुख्य फोकस वर्ष 2009 से 2014 के बीच हुए कार्यों पर है। बताया जा रहा है कि भवन निर्माण फंड के आवंटन, विभिन्न ठेकों और उस दौरान की गई नियुक्तियों में गंभीर विसंगतियों की शिकायतें थीं। CBI के अधिकारियों ने प्रशासनिक भवन के कई विभागों को अपने नियंत्रण में ले लिया और महत्वपूर्ण दस्तावेजों को जब्त करना शुरू कर दिया।

कैंपस में जांच और हड़कंप

यूनिवर्सिटी के सूत्रों ने बताया कि CBI की टीम ने कुछ अधिकारियों के मोबाइल फोन भी जांच के दायरे में लिए हैं और कंप्यूटरों से डिजिटल डेटा की रिकवरी की जा रही है। इससे पहले भी विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों को लेकर केंद्रीय एजेंसियां जांच कर चुकी हैं, लेकिन मंगलवार की इस ‘औचक दबिश’ ने पुराने मामलों की गंभीरता को फिर से उजागर कर दिया है। फिलहाल, CBI की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन कैंपस में देर शाम तक जांच की प्रक्रिया जारी रही।

CUJ जांच घटनाक्रम : 2009 से 2026 तक

वर्ष प्रमुख घटनाक्रम एवं जांच के चरण
2009 संसद के अधिनियम के तहत रांची के पास ब्राम्बे में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड की स्थापना हुई।
2010 – 2012 स्थायी कैंपस (चेरी-मनातु) के लिए 300 करोड़ रुपये का फंड आवंटित हुआ। निर्माण कार्यों में अनियमितताओं की पहली शिकायतें सामने आईं।
2012 (दिसंबर) केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय (HRD) और CVC के निर्देश पर CBI ने शुरुआती जांच (Preliminary Enquiry) शुरू की।
2014 (जुलाई) CBI ने औपचारिक रूप से FIR दर्ज की। पूर्व कुलपति (VC) डी.टी. खातिंग, तत्कालीन रजिस्ट्रार और ओएसडी (प्रोजेक्ट) को मुख्य आरोपी बनाया गया।
2014 (नवंबर) CBI ने रांची, दिल्ली और शिलांग सहित 24 ठिकानों पर छापेमारी की। ₹100 करोड़ के संभावित घोटाले और ₹9 करोड़ के फर्नीचर खरीद घोटाले का खुलासा हुआ।
2016 – 2017 CBI ने अपनी जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल की। यूनिवर्सिटी के बैंक खातों को फ्रीज कर दिया गया, जिससे निर्माण कार्य ठप हो गया।
2018 – 2021 नए प्रबंधन के प्रयासों के बाद कुछ खातों से रोक हटी। 2021 में शिक्षा मंत्रालय की 5-सदस्यीय टीम ने 62 गैर-शिक्षण और 40 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों पर हुई ‘गलत नियुक्तियों’ की जांच शुरू की।
2024 (अगस्त) CBI की आर्थिक अपराध शाखा ने यूनिवर्सिटी से जुड़े वित्तीय लेन-देन और बैंक फ्रॉड के कुछ अन्य मामलों में नई FIR दर्ज की।
2026 (फरवरी) 24 फरवरी को CBI की टीम ने फिर से कैंपस में दबिश दी। यह कार्रवाई नियुक्तियों में भ्रष्टाचार और पुराने लंबित निर्माण कार्यों की फाइलों को लेकर की गई है।

प्रमुख आरोप और जांच के बिंदु

निर्माण घोटाला : एक्सप्रेस ऑफ इंटरेस्ट (EOI) के दौरान नियमों को ताक पर रखकर चहेते ठेकेदारों को महंगे दामों पर काम आवंटित करना।

फर्जी पद सृजन : आरोप है कि तत्कालीन कुलपति ने यूजीसी के नियमों के विरुद्ध अपने करीबी मित्रों के लिए उच्च वेतन वाले पद (जैसे OSD Projects) सृजित किए।

नियुक्ति धांधली (2017-2019) : रोस्टर और आरक्षण नियमों की अनदेखी कर करीब 100 से अधिक शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों पर अवैध नियुक्तियों का आरोप।

दस्तावेजों की चोरी : पूर्व में की गई छापेमारी में पाया गया था कि टेंडर से जुड़ी महत्वपूर्ण मूल फाइलें अधिकारियों के निजी आवासों से बरामद हुई थीं।

वर्तमान स्थिति : आज क्या हुआ?

आज की छापेमारी में CBI ने प्रशासनिक भवन के कंप्यूटरों का डेटा और पिछले पांच वर्षों के नियुक्ति रजिस्टर को अपने कब्जे में लिया है। कई वर्तमान अधिकारियों से बंद कमरे में पूछताछ भी की जा रही है। सूत्रों के अनुसार CBI की टीम काे जिन अधिकारियों पर संदेह है, वह उनके बैंक खातों की फॉरेंसिक ऑडिट करा सकती है। आज की छापेमारी में ‘बेनामी संपत्ति’ और ‘मनी ट्रेल’ (पैसे का लेन-देन) से जुड़े कुछ नए दस्तावेज मिले हैं। CBI की इस कार्रवाई से कई मौजूदा संविदा कर्मियों (Contractual Staff) की नियुक्तियों पर भी तलवार लटक गई है, जिनकी फाइलें आज जब्त की गई हैं।

जांच के घेरे में आए प्रमुख अधिकारी

डॉ. डी.टी. खातिंग (पूर्व कुलपति) : CBI की FIR में इन्हें मुख्य आरोपी बनाया गया है। इन पर आरोप है कि इन्होंने नियमों के विरुद्ध जाकर निर्माण कार्य और फर्नीचर खरीद के टेंडर अपने चहेतों को आवंटित किए।

उमाशंकर (पूर्व ओएसडी, प्रोजेक्ट) : इन्हें कुलपति का बेहद करीबी माना जाता था। आरोप है कि बिना उचित प्रक्रिया के इस पद का सृजन किया गया और निर्माण कार्यों की पूरी जिम्मेदारी इन्हें सौंपी गई ताकि कमीशन का खेल खेला जा सके।

रत्न कुमार (तत्कालीन रजिस्ट्रार) : प्रशासनिक फाइलों और नियुक्तियों के दौरान नियमों की अनदेखी करने और फर्जीवाड़े को अनुमति देने के आरोप में इन पर जांच चल रही है।

नृपेंद्र नाथ (तत्कालीन वित्त अधिकारी) : धन के अनधिकृत आवंटन और ऑडिट रिपोर्ट में हेरफेर करने के आरोपों के कारण CBI की रडार पर हैं।

प्रमुख ठेका कंपनियाँ और फर्में जांच के घेरे में

BPL और गोदरेज : फर्नीचर की आपूर्ति के मामले में इन कंपनियों के स्थानीय वितरकों के साथ मिलकर करोड़ों रुपये की हेराफेरी की गई। जांच में पाया गया कि बाजार भाव से 40% से 50% अधिक दरों पर बिलिंग की गई थी।

कंस्ट्रक्शन कंपनियां (Lanco & Local Contractors) : कैंपस के प्रशासनिक भवन और हॉस्टल निर्माण के लिए जिन फर्मों को टेंडर दिया गया था, उन्होंने घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया। CBI ने पाया कि निर्माण कार्य का भौतिक सत्यापन (Physical Verification) कागजों पर दिखाई गई लागत से मेल नहीं खाता।

मानव संसाधन एजेंसियां (Outsourcing Agencies) : यूनिवर्सिटी में गार्ड, सफाईकर्मी और कंप्यूटर ऑपरेटरों की आपूर्ति के लिए चुनी गई एजेंसियों के चयन में भी भारी भ्रष्टाचार पाया गया, जिनमें से कुछ कंपनियां तो केवल कागजों पर ही मौजूद थीं।

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