Health Desk: चिलचिलाती गर्मियों का मौसम अपने साथ पाचन संबंधी ढेरों परेशानियां लेकर आता है। ऐसे में लोग अक्सर दवाइयों की ओर भागते हैं, लेकिन हमारे पास एक ऐसा प्राकृतिक और आयुर्वेदिक खजाना है, जो सदियों से रसोई का हिस्सा रहा है। वह है— ‘बुकनू’। उत्तर प्रदेश के कानपुर और आसपास के इलाकों में प्रसिद्ध यह मसाला महज एक स्वाद बढ़ाने वाला पाउडर नहीं है, बल्कि दुर्लभ जड़ी-बूटियों का एक संतुलित मिश्रण है जो पेट के लिए किसी वरदान से कम नहीं।

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आयुर्वेदिक परंपरा का स्वादिष्ट हिस्सा— यूपी टूरिज्म डिपार्टमेंट भी बुकनू को आयुर्वेदिक परंपरा का एक गौरवशाली हिस्सा मानता है। इसे बनाने में सोंठ, काला नमक, हींग, मेथी, अजवाइन, हल्दी और जीरा जैसे तत्वों को एक निश्चित अनुपात में मिलाया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, ये जड़ी-बूटियां शरीर की ‘पाचन अग्नि’ को संतुलित रखने का काम करती हैं। जहां सोंठ और अजवाइन मेटाबॉलिज्म को तेज करते हैं, वहीं हींग और काला नमक गैस व एसिडिटी को तुरंत शांत करने में मददगार होते हैं।

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कैसे करें इस्तेमाल?— कानपुर के घरों में बुकनू को पीढ़ी-दर-पीढ़ी घरेलू नुस्खे के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। लोग इसे परांठे, दाल-चावल, सलाद या चटनी पर छिड़ककर बड़े चाव से खाते हैं। गर्मियों में भारी भोजन के बाद होने वाली कच्ची डकारें, पेट फूलना और अपच जैसी समस्याओं के लिए एक चुटकी बुकनू जादू की तरह काम करता है।

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हां, प्राकृतिक मसालों का यह मेल न केवल भोजन का जायका बढ़ाता है, बल्कि संक्रमण से बचाव कर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बेहतर बनाता है। यही कारण है कि आज के दौर में भी ‘बुकनू’ की लोकप्रियता कम नहीं हुई है, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग इसे अपनी डाइट में प्रमुखता से शामिल कर रहे हैं।

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