34 वर्ष की अल्पायु में रचा अमर साहित्य, क्यों कहलाए ‘युगचारण’ भारतेन्दु?
Ranchi : आधुनिक हिंदी साहित्य का जब भी इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें सबसे पहला और स्वर्णिम नाम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का ही होगा। 9 सितंबर 1850 को काशी के प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में जन्मे हरिश्चन्द्र को विद्वानों ने उनकी बहुमुखी प्रतिभा और साहित्यिक योगदान के कारण ‘भारतेन्दु’ यानी भारत का चंद्रमा की उपाधि दी। मात्र 34 वर्ष की आयु में ही उन्होंने हिंदी साहित्य, समाज और राष्ट्र-चेतना की ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि उन्हें आधुनिक हिंदी का जनक और भारतीय नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है।
भारतेन्दु का लेखन उस दौर में सामने आया जब देश अंग्रेज़ी हुकूमत की दमनकारी नीतियों और सामाजिक रूढ़ियों से जकड़ा हुआ था। उन्होंने अपने नाटकों, कविताओं और पत्रकारिता के माध्यम से न सिर्फ शोषण और पराधीनता पर प्रहार किया बल्कि समाज में नवजागरण की अलख भी जगाई। उनका मशहूर नाटक अंधेर नगरी आज भी समाज और शासन की विसंगतियों पर सटीक व्यंग्य माना जाता है।
भारतेन्दु बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने हिंदी नाटक को संगठित रूप दिया, कविताओं में शृंगार, भक्ति और देशप्रेम का समावेश किया तथा पत्रकारिता को नई दिशा प्रदान की। हरिश्चन्द्र चन्द्रिका, कविवचनसुधा और बाला बोधिनी जैसी पत्रिकाओं का संपादन कर उन्होंने हिंदी पत्रकारिता की नींव को मजबूती दी। इतना ही नहीं, उन्होंने व्यंग्य लेखन और निबंधों के जरिए समाज की कुरीतियों पर चोट की और सुधार की राह दिखाई।
भारतेन्दु का साहित्य केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं था, बल्कि उसमें स्पष्ट रूप से राष्ट्रप्रेम और साम्राज्यवाद-विरोधी चेतना दिखाई देती है। उन्होंने अंग्रेज़ी शासन की शोषक नीतियों का पर्दाफाश करते हुए कहा था कि अंग्रेज़ भारत से धन लूटकर ले जाते हैं और यही गरीबी का सबसे बड़ा कारण है। उनकी कविता भारत-दुर्दशा इस सत्य का जीवंत प्रमाण है।
समाज सुधार की दृष्टि से भी भारतेन्दु की भूमिका महत्वपूर्ण रही। वे स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे और मानते थे कि जब तक महिलाएं शिक्षित नहीं होंगी, समाज की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है। उन्होंने स्वदेशी वस्त्रों के प्रयोग और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का आह्वान किया, जो बाद में आज़ादी की लड़ाई में एक बड़े आंदोलन का स्वरूप ले सका।
भारतेन्दु की रचनाशक्ति का सबसे बड़ा परिचय यह है कि उन्होंने बेहद अल्पायु में ही विशाल और विविध साहित्य की रचना की। नाटक, कविता, निबंध, यात्रा-वृत्तांत, व्यंग्य और पत्रकारी लेखन, हर विधा में उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी।
1885 में जब उनका निधन हुआ, तब हिंदी साहित्य और समाज ने एक सच्चे मार्गदर्शक को खो दिया। परंतु उनकी कृतियों और विचारों ने आने वाली पीढ़ियों के लिए पथप्रदर्शक का कार्य किया। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनके युग को ही ‘भारतेन्दु युग’ नाम दिया, जो आज भी हिंदी साहित्य के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
भारतेन्दु ने स्वयं लिखा था—
“निज भाषा उन्नति लहै, सब उन्नति को मूल।”
यह पंक्ति आज भी हिंदी भाषा और साहित्य की प्रगति के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है। इसका अर्थ है अपनी मातृभाषा का विकास ही सभी प्रकार की उन्नति का मूल आधार है क्योंकि अपनी भाषा के ज्ञान के बिना हृदय की पीड़ा को दूर नहीं किया जा सकता। यह दोहा मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करता है और देश के संपूर्ण विकास के लिए अपनी भाषा को बढ़ावा देने पर जोर देता है।



