World News: दक्षिण अमेरिका का एक छोटा सा देश वेनेजुएला, जिसकी आबादी महज 2.8 करोड़ है, आज दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की आंखों में आंखें डालकर खड़ा है। पनामा नहर के प्रवेश द्वार पर 30 अगस्त 2025 को तैनात अमेरिकी नौसेना का गाइडेड मिसाइल विध्वंसक और कैरिबियन सागर में बढ़ती सैन्य हलचल एक ही सवाल खड़ा करती है—क्या यह सब सिर्फ लोकतंत्र के लिए है या इसके पीछे छिपा है दुनिया का सबसे बड़ा तेल का खजाना?
1920 से शुरू हुई तेल की कहानी और दोस्ती
वेनेजुएला का अमेरिका से रिश्ता दशकों पुराना है। 19वीं सदी में स्पेन से आजादी के बाद जब 1920 के दशक में यहाँ तेल के विशाल भंडार मिले, तो अमेरिकी कंपनियों ने यहाँ डेरा डाल दिया। उस वक्त दोनों देशों के बीच मधुर संबंध थे। हालत यह थी कि 1990 के दशक तक अमेरिका अपनी जरूरत का 15% तेल अकेले वेनेजुएला से खरीदता था। लेकिन साल 1999 में ह्यूगो शावेज के सत्ता में आने के बाद सब कुछ बदल गया। शावेज ने नारा दिया—”तेल हमारा है, तो मुनाफा अमेरिका क्यों ले जाए?”
ह्यूगो शावेज: वो नेता जिसने अमेरिकी कंपनियों को खदेड़ा
सोशलिस्ट विचारधारा वाले शावेज ने आते ही तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और अमेरिकी कंपनियों की हिस्सेदारी खत्म कर दी। इससे अमेरिका तिलमिला उठा। 2002 में शावेज के खिलाफ तख्तापलट की नाकाम कोशिश हुई, जिसका आरोप सीधे तौर पर अमेरिका पर लगा। 2003 से 2008 के बीच जब कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, तो शावेज ने अमेरिकी कंपनियों को पूरी तरह बाहर कर सारा पैसा गरीबों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करना शुरू किया। यहीं से दोनों देशों के बीच वह दरार पैदा हुई जो आज खाई बन चुकी है।
सैन्य घेराबंदी और भविष्य का संकट
आज वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है, जो अरब देशों से भी अधिक है। लेकिन अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों और आंतरिक भ्रष्टाचार के कारण यह देश उत्पादन में पिछड़ गया है। अमेरिकी नौसेना की ताजा तैनाती को विशेषज्ञ इसी संदर्भ में देख रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि अमेरिका मानवाधिकारों की आड़ में वेनेजुएला की ऊर्जा संपदा पर अपना नियंत्रण वापस चाहता है। यदि तनाव और बढ़ता है, तो यह न केवल दक्षिण अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।



