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रांची: राजधानी के खादगड़ा शिव दुर्गा मंदिर रोड स्थित मुंडारी प्रकृति की जमीन पर बने 12 घरों को ध्वस्त करने के मामले में झारखंड उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति राजेश शंकर की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए न केवल याचिकाकर्ता महादेव उरांव की कार्यशैली पर सवाल उठाए, बल्कि उन्हें अदालत को गुमराह करने के आरोप में कारण बताओ नोटिस (अवमानना) भी जारी कर दिया है।
क्या है पूरा विवाद?
मामला सुखदेवनगर क्षेत्र का है, जहाँ जिला प्रशासन ने 12 मकानों को अवैध बताकर उन पर बुलडोजर चलाने का आदेश दिया था। स्थानीय निवासियों का दावा है कि उन्होंने यह जमीन ₹5.25 लाख प्रति कट्ठा की दर से खरीदी थी। कुल 38.25 डिसमिल जमीन के लिए पीड़ितों ने लगभग 1 करोड़ 8 लाख 93 हजार 750 रुपये का भुगतान किया था। वर्षों से रह रहे इन परिवारों के आशियाने पर जब अचानक प्रशासन का बुलडोजर पहुँचा, तो हाहाकार मच गया।
अदालत ने क्यों दिखाया कड़ा रुख?
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता महादेव उरांव ने शपथ पत्र में गलत तथ्य पेश किए। अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा:
“शपथ पत्र में झूठे तथ्य प्रस्तुत कर न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास किया गया है। पीड़ितों (हस्तक्षेपकर्ताओं) से हुए पैसों के लेन-देन की जानकारी को जानबूझकर छिपाया गया।”
अदालत ने याचिकाकर्ता से सीधा सवाल किया कि उनके खिलाफ अवमानना और फौजदारी कानूनों के तहत कार्रवाई क्यों न की जाए?
पीड़ित परिवारों को मिली अंतरिम राहत
एक ओर जहाँ याचिकाकर्ता की मुश्किलें बढ़ी हैं, वहीं दूसरी ओर बेघर होने की कगार पर खड़े 12 परिवारों के लिए राहत की खबर आई है। अदालत ने हस्तक्षेपकर्ताओं को दी गई अंतरिम राहत को 19 जून तक बढ़ा दिया है। इसका मतलब है कि अगली सुनवाई तक इन घरों पर किसी भी प्रकार की दंडात्मक या ध्वस्तीकरण (बुलडोजर) की कार्रवाई नहीं की जा सकेगी।
प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल
इससे पहले हेहल अंचल कार्यालय ने दलील दी थी कि नोटिस के बावजूद दस्तावेज नहीं दिखाने पर कार्रवाई की गई। इस पर अदालत ने पहले ही तीखा सवाल पूछा था कि आखिर केवल कब्जा हटाने के बजाय मकानों को सीधे जमींदोज करने की हड़बड़ी क्यों दिखाई गई? अब इस मामले की अगली सुनवाई 19 जून को तय की गई है, जहाँ याचिकाकर्ता को अपने बचाव में जवाब दाखिल करना होगा।

