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Washington (US): ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में सब कुछ वैसा नहीं था जैसा आज हम देखते हैं। नई स्टडी के अनुसार, शुरुआती ब्रह्मांड आज की तुलना में कहीं अधिक उथल-पुथल और गैस से भरा हुआ था। आयरलैंड की मेनुथ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से यह पता लगाया है कि कैसे नन्हे ब्लैक होल महज कुछ करोड़ वर्षों में भीमकाय आकार के ‘दानव’ बन गए।
क्या है ‘सुपर एडिंगटन एक्रीशन’ का जादू?
अध्ययन के मुख्य लेखक दक्शिल मेहता और डॉ. जॉन रीगन के अनुसार, शुरुआती अंतरिक्ष घनी गैस और धूल से भरा हुआ था। इस माहौल ने नवजात ब्लैक होल को असाधारण मात्रा में पदार्थ निगलने का मौका दिया। सामान्य तौर पर, जब ब्लैक होल तेजी से पदार्थ निगलता है, तो उससे निकलने वाली ऊर्जा आसपास की गैस को दूर धकेल देती है, जिससे उसकी बढ़त रुक जाती है। लेकिन शुरुआती ब्रह्मांड में गैस की इतनी भरमार थी कि यह प्राकृतिक सीमा टूट गई। इस प्रक्रिया को ‘सुपर एडिंगटन एक्रीशन’ कहा जाता है, जिसकी बदौलत छोटे ब्लैक होल ने रिकॉर्ड रफ्तार से अपना वजन बढ़ाया।
पुरानी थ्योरी को चुनौती
अब तक वैज्ञानिक मानते थे कि विशालकाय ब्लैक होल बनने के लिए उनका जन्म ही ‘हैवी सीड’ (लाखों गुना भारी) के रूप में होना चाहिए। लेकिन कंप्यूटर सिमुलेशन ने दिखाया है कि सामान्य आकार के छोटे ब्लैक होल (लाइट सीड) भी अगर सही परिस्थितियों में हों, तो वे बहुत जल्दी भीमकाय आकार ले सकते हैं।
2035 के ‘लिसा’ मिशन को मिलेगी मजबूती
यह खोज न केवल अतीत को समझने के लिए जरूरी है, बल्कि भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों के लिए भी मील का पत्थर साबित होगी। नासा (NASA) और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का ‘लिसा’ (LISA) मिशन, जो 2035 में लॉन्च होगा, इसी स्टडी के आधार पर गुरुत्वाकर्षण तरंगों और ब्लैक होल के विलय का अध्ययन करेगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि जेम्स वेब टेलीस्कोप ने अंतरिक्ष के उस सच से पर्दा उठाया है जो अब तक हमारी कल्पनाओं से परे था।
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