अपनी भाषा चुनेें :
बटन दबाकर थोड़ा इंतज़ार करें...
Ranchi News : प्रति वर्ष जब मुहर्रम का महीना आता है, तो सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक कहानी की यादें ताजा हो जाती हैं। यह कहानी है कर्बला की, जहां सच्चाई, इमान और मानवता की रक्षा के लिए एक महान बलिदान हुआ था। इस दिन को याद करना केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि उस संघर्ष और साहस को समझना है जो इंसानियत के लिए मिसाल बन गया।
मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना होता है और इसका 10वां दिन, जिसे यौम-ए-आशूरा कहा जाता है, खास महत्व रखता है। इसी दिन पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) के नवासे हजरत इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने परिवार और 72 साथियों सहित कर्बला के मैदान में यजीदी ताकतों के खिलाफ इमान और सच्चाई के लिए जान की बाजी लगा दी थी।
कर्बला की जंग : सत्ता बनाम सच्चाई

सन् 680 ई0 में इराक के कर्बला मैदान में जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक युद्ध नहीं था। वह सत्य और असत्य, इंसाफ और जुल्म, इमान और अधर्म के बीच का निर्णायक मोड़ था। यजीद एक अन्यायी शासक था, जो इस्लाम को अपनी राजनीतिक इच्छाओं के मुताबिक मोड़ना चाहता था। उसने इमाम हुसैन से अपनी बैअत (वफादारी की शपथ) लेने की कोशिश की, लेकिन इमाम ने न झुकने का फैसला किया।
इमाम हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के साथ कर्बला पहुंचे। वहां उन्हें पानी से महरूम कर दिया गया, बच्चों तक को प्यासा रखा गया। इसके बावजूद, उन्होंने सच्चाई से समझौता नहीं किया। एक-एक कर उनके सभी साथियों और परिजनों को शहीद कर दिया गया, लेकिन हुसैन डटे रहे। आखिरकार, 10 मुहर्रम को इमाम हुसैन भी शहीद कर दिए गए।
इमाम हुसैन की शहादत : इंसानियत का आलोकस्तंभ
कर्बला की घटना हमें सिखाती है कि जब बात इंसाफ और मानव मूल्यों की हो, तो डर, भूख और मौत भी किसी सच्चे इंसान को नहीं रोक सकते। इमाम हुसैन ने दुनिया को यह बताया कि सिर्फ जीतना ही अहम नहीं होता, बल्कि किस चीज के लिए लड़ना ज्यादा मायने रखता है।
उनकी शहादत न केवल इस्लाम के अनुयायियों के लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा है। यही कारण है कि मुहर्रम केवल मातम या गम का महीना नहीं है, बल्कि आत्ममंथन और मूल्यबोध का समय है।
क्यों आज भी जिंदा है कर्बला का संदेश

आज जब दुनिया एक बार फिर असमानता, अन्याय और धार्मिक असहिष्णुता से जूझ रही है, कर्बला का संदेश और भी प्रासंगिक हो गया है। इमाम हुसैन ने साबित कर दिया कि सच्चाई के लिए अकेला खड़ा होना ही सबसे बड़ा जिहाद है।
मुहर्रम के दौरान ताजिया, मातमी जुलूस और मजलिसें इसी बात की याद दिलाती हैं कि सच्चाई, बलिदान और ईमानदारी कभी पुरानी नहीं होती। हर पीढ़ी को यह कहानी फिर से बताई जाती है, ताकि भावी समाज बेहतर और न्यायपूर्ण बने।
मुहर्रम का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं, सामाजिक भी
मुहर्रम केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो न्याय, मानवता और आत्मबल को मानता है। कई जगहों पर विभिन्न धर्मों के लोग भी इमाम हुसैन की कुर्बानी को सम्मान देते हैं। यह एकता, सहिष्णुता और सामाजिक सौहार्द का उदाहरण है।
कर्बला की घटना हमें बताती है कि जब इमान, सच्चाई और इंसानियत की बात हो, तो कुर्बानी से पीछे नहीं हटना चाहिए। मुहर्रम का महीना केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि एक जीवंत संदेश है कि सत्य कभी हारता नहीं, भले ही वो मैदान में अकेला क्यों न हो। इमाम हुसैन की यह कुर्बानी आज भी दुनिया के कोने-कोने में इंसानियत का दीप जलाए हुए है।

