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रांची: सदन में गुरुवार को धान खरीद की धीमी रफ्तार और पैक्स (PAX) की कार्यप्रणाली को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जमकर तलवारें खिंचीं। विधायक अरूप चटर्जी ने आंकड़ों के साथ सरकार को घेरते हुए कहा कि राज्य ने 6 लाख मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब तक केवल 3 लाख मीट्रिक टन की ही खरीद हो पाई है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब आधे से ज्यादा प्रखंडों में पैक्स निष्क्रिय हैं, तो लक्ष्य कैसे पूरा होगा?
31 मार्च के बाद बढ़ सकती है तारीख
विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए विभागीय मंत्री इरफान अंसारी ने स्वीकार किया कि मैनपावर की कमी और गोदामों की दूरस्थ लोकेशन के कारण प्रक्रिया थोड़ी धीमी हुई है। हालांकि, उन्होंने किसानों को राहत देते हुए कहा कि सरकार पहली बार ‘वन टाइम पेमेंट’ की सुविधा दे रही है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यदि जरूरत पड़ी, तो धान खरीद की अंतिम तिथि (31 मार्च) को आगे भी बढ़ाया जाएगा ताकि कोई भी किसान वंचित न रहे।
बाबूलाल मरांडी का तीखा प्रहार: “बिचौलियों की चांदी काट रही सरकार”
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मार्च के अंत तक खरीद का लक्ष्य रखना सीधे तौर पर बिचौलियों को फायदा पहुँचाना है। मरांडी ने तर्क दिया कि धान की कटनी के बाद किसान को तुरंत पैसे की जरूरत होती है, ऐसे में देरी का फायदा उठाकर बिचौलिए कम दाम पर धान खरीद लेते हैं। उन्होंने मांग की कि सरकार को जनवरी तक ही खरीद का लक्ष्य पूरा करने की फूलप्रूफ योजना बनानी चाहिए थी। साथ ही उन्होंने बिहार सीमा से सटे इलाकों में हो रही खरीद की विसंगतियों पर भी ध्यान आकृष्ट कराया।
700 बनाम 4408 : पैक्स के इस्तेमाल पर घिरी सरकार
कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने भी विभागीय खामियों को उजागर करते हुए बताया कि राज्य में कुल 4408 पैक्स और लैंप्स हैं, लेकिन वर्तमान में धान खरीद के लिए केवल 700 से 800 का ही उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने बेहतर मैपिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल पर जोर दिया। वहीं, विधायक हेमलाल मुर्मू ने किसानों के साथ हो रही सबसे बड़ी नाइंसाफी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि धान खरीद के दौरान प्रति क्विंटल 10 किलो की अवैध कटौती की जा रही है, जो गरीब किसानों की जेब पर सीधा डाका है। सदन में हुई इस चर्चा ने साफ कर दिया कि कागजों पर लक्ष्य बड़े जरूर हैं, लेकिन धरातल पर किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए अब भी कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है।

