Washington, (USA): ईरान के साथ युद्ध शुरू हुए दो महीने से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस मकसद के साथ इस सैन्य अभियान में उतरे थे, वह लक्ष्य आज भी धुंधला नजर आ रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि न तो अमेरिका को अब तक कोई निर्णायक जीत मिली है और न ही ईरान झुकने के संकेत दे रहा है। यह गतिरोध अब एक ऐसी अंतहीन लड़ाई का रूप लेता जा रहा है, जो न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द बन गया है। ट्रंप के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी उस राजनीतिक विरासत को बचाने की है, जो इस टकराव के कारण दांव पर लग गई है।

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जिद पर अड़ा नेतृत्व और कूटनीतिक विफलता

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस वक्त वाशिंगटन और तेहरान, दोनों ही अपनी-अपनी जिद पर अड़े हैं। ईरान ने हाल ही में बातचीत का एक नया प्रस्ताव भेजा था, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप ने सिरे से खारिज कर दिया। पाकिस्तान के जरिए भी सुलह की कोशिशें हुईं, लेकिन ट्रंप ने अपने वार्ताकारों की इस्लामाबाद यात्रा रद्द कर दी। तेहरान का प्रस्ताव था कि युद्ध खत्म होने तक परमाणु चर्चा टाल दी जाए और होर्मुज जलडमरूमध्य को खोल दिया जाए, लेकिन ट्रंप शुरुआत में ही परमाणु मुद्दे पर ठोस गारंटी चाहते हैं। इस खींचतान के कारण शांति का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।

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महंगाई की मार और गिरती रेटिंग

इस अनसुलझे संघर्ष का सबसे बड़ा खामियाजा अमेरिकी जनता भुगत रही है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी ढंग से बंद कर रखा है, जहां से दुनिया का पांचवां हिस्सा तेल गुजरता है। इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ा है और अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें 4 डॉलर प्रति गैलन के पार जा चुकी हैं। जनता के बढ़ते गुस्से का असर राष्ट्रपति की लोकप्रियता पर भी दिख रहा है। ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर महज 34 फीसदी पर आ गई है, जो उनके कार्यकाल का सबसे निचला स्तर है।

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अधूरे लक्ष्य और भविष्य की चुनौती

जब ट्रंप प्रशासन ने इजराइल के साथ मिलकर ईरान पर हमले शुरू किए थे, तो उनके निशाने पर ईरान का परमाणु कार्यक्रम और वहां की सत्ता में परिवर्तन था। हालांकि सैन्य हमलों ने ईरान को नुकसान जरूर पहुंचाया है, लेकिन वहां न तो सरकार बदली और न ही ईरान ने परमाणु हथियारों की जिद छोड़ी है। नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव रिपब्लिकन पार्टी के लिए अब डरावने साबित हो सकते हैं। इतिहास गवाह है कि तेल की बढ़ती कीमतें सत्ताधारी दल को ले डूबती हैं। व्हाइट हाउस भले ही कहे कि उनके पास वक्त है, लेकिन असलियत में समय की सुई अब ट्रंप के खिलाफ चल रही है।

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