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रांची: झारखंड विधानसभा का बजट सत्र सोमवार को उस समय हंगामेदार हो गया, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राज्य के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच हुई एक कथित ‘ऑडियो रिकॉर्डिंग’ को लेकर तीखी बहस छिड़ गई। यह मामला प्रशासनिक गलियारों से निकलकर सीधे सदन के पटल पर पहुँच गया, जिससे राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है।
क्या है पूरा मामला?
झारखंड के एक वरिष्ठ आईएएस (IAS) और एक आईपीएस (IPS) अधिकारी के बीच हुई बातचीत की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। इसी मुद्दे को आधार बनाकर नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सदन में सरकार को घेरा। मरांडी ने इस घटना को राज्य की गोपनीयता और सुरक्षा के लिहाज से बेहद गंभीर बताया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जो ऑडियो पूरे राज्य में घूम रहा है, वह अभी तक सरकार के कानों तक नहीं पहुँचा है।
गोपनीयता पर खड़े हुए बड़े सवाल
बाबूलाल मरांडी ने सदन में अपनी बात रखते हुए कहा कि यदि राज्य के सबसे जिम्मेदार पदों पर बैठे वरिष्ठ अधिकारियों की निजी बातचीत इस तरह सार्वजनिक हो सकती है, तो यह एक खतरनाक संकेत है। उन्होंने चिंता जताई कि अगर आज आईएएस और आईपीएस सुरक्षित नहीं हैं, तो कल विधानसभा अध्यक्ष, मंत्रियों और विधायकों की बातचीत भी अवैध रूप से रिकॉर्ड या लीक की जा सकती है। उन्होंने इसे ‘प्राइवेसी’ का उल्लंघन बताते हुए पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की मांग की। उन्होंने यहाँ तक कहा कि यदि सरकार के पास वह ऑडियो नहीं है, तो वह खुद अगले दिन सदन में इसे उपलब्ध करा देंगे।
सरकार का पक्ष : “साक्ष्य दें, हम कार्रवाई करेंगे”
विपक्ष के तीखे हमलों का जवाब देते हुए संसदीय कार्य सह वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सरकार का रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि फिलहाल आधिकारिक तौर पर ऐसी कोई भी ऑडियो रिकॉर्डिंग सरकार के पास उपलब्ध नहीं है। मंत्री ने सदन को भरोसा दिलाया कि सरकार किसी भी प्रकार की प्रशासनिक अनियंत्रण को बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने कहा, “यदि माननीय सदस्य वह रिकॉर्डिंग सरकार को उपलब्ध कराते हैं, तो सरकार निश्चित रूप से उसका संज्ञान लेगी। उसकी सत्यता की जांच कराई जाएगी और यदि कोई दोषी पाया जाता है, तो कानून सम्मत सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
सदन में अन्य सदस्यों का मिला समर्थन
इस चर्चा के दौरान केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि अन्य सदस्यों ने भी मामले की गंभीरता को समझा। विधायक नवीन जायसवाल सहित कई अन्य विधायकों ने भी इस चर्चा में हस्तक्षेप किया। सदस्यों का मानना था कि ब्यूरोक्रेसी के शीर्ष स्तर पर इस तरह की गुटबाजी या रिकॉर्डिंग का लीक होना राज्य की छवि को धूमिल करता है। सदन में काफी देर तक इस विषय पर गहमागहमी बनी रही और विपक्ष ने सरकार से इस पर तुरंत विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने या उच्च स्तरीय जांच की घोषणा करने का दबाव बनाया।
फिलहाल, गेंद अब विपक्ष के पाले में है। यदि कल सदन में बाबूलाल मरांडी वह कथित ऑडियो पेश करते हैं, तो झारखंड की राजनीति में एक नया मोड़ आना तय है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस ‘डिजिटल साक्ष्य’ पर क्या कदम उठाती है और क्या इससे राज्य की नौकरशाही में कोई बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा।

