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Bihar News: बिहार के इकलौते वाल्मीकि टाइगर रिजर्व (वीटीआर) में बाघों की गणना को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। अब बाघों की गिनती पारंपरिक ट्रैकिंग पद्धति से नहीं, बल्कि आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों और मैन्युअल तरीकों के समन्वय से की जा रही है। वन कर्मियों को इसके लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसमें कैमरा ट्रैप और एम-स्ट्राइप (M-Stripes) नामक मोबाइल एप्लिकेशन का उपयोग शामिल है।
पहले बाघों की गिनती के लिए उनके पंजों के निशान में चूना देकर पहचान पुख्ता की जाती थी, लेकिन अब तकनीक ने इस पूरी प्रक्रिया को क्रांतिकारी बना दिया है। ‘एम-स्ट्राइप’ मोबाइल ऐप जीपीएस (GPS) की तरह काम करता है, जिसके डेटा को गश्त के बाद टाइगर सेल में सुरक्षित रखा जाता है।
धारियों का रहस्य: फिंगरप्रिंट की तरह हर बाघ है अद्वितीय
बाघों की गिनती की सबसे भरोसेमंद विधि है कैमरा ट्रैप तकनीक। बाघों के आवाजाही वाले मार्गों के दोनों ओर कैमरे लगाए जाते हैं। जब बाघ उस मार्ग से गुजरते हैं, तो उनकी तस्वीरें स्वतः कैद हो जाती हैं। इसके बाद, बाघों के शरीर पर बनी धारियों (Stripes) की मिलान की जाती है। इस गणना में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की भूमिका अहम है। संस्थान द्वारा विशेष प्रशिक्षण प्राप्त फील्ड वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट सौरभ वर्मा के अनुसार, “दो इंसानों के फिंगरप्रिंट कभी एक जैसे नहीं होते, ठीक उसी प्रकार बाघों के शरीर पर बनी धारियां भी कभी एक जैसी नहीं होतीं। यह धारियां ही हर बाघ का अद्वितीय पहचान पत्र हैं।”
वीटीआर में बाघों की संख्या का इतिहास काफी रोचक रहा है। वर्ष 2000-01 में जहां इनकी संख्या करीब 30 थी, वहीं 2010 में यह घटकर महज आठ रह गई थी। लेकिन संरक्षण प्रयासों के चलते साल 2014 की गणना में यह संख्या आठ से बढ़कर 28 हो गई, और 2022 की गणना में यह चौंकाने वाला आंकड़ा 54 तक पहुंच गया।
देहरादून से होगी अंतिम घोषणा: हर चार साल में आकलन
सीएफ नेशमणि ने इस संदर्भ में बताया कि देशभर में ऑल इंडिया टाइगर एस्टिमेशन के तहत यह गणना हर चार साल में एक बार की जाती है। इसका उद्देश्य देश में बाघों की वास्तविक संख्या, उनके आवास क्षेत्र और संरक्षण की स्थिति का सटीक आकलन करना है। बाघों की वास्तविक संख्या की औपचारिक घोषणा देहरादून स्थित राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा की जाएगी। इस वैज्ञानिक पद्धति से न केवल संख्या का आकलन होता है, बल्कि बाघों के मूवमेंट पैटर्न और क्षेत्रीय विस्तार से जुड़ा महत्वपूर्ण डेटा भी प्राप्त होता है, जो भविष्य में संरक्षण नीतियां बनाने में सहायक सिद्ध होता है।

