जन्मदिन विशेष : दुर्गा सोरेन

Ranchi : झारखंड की राजनीति में सोरेन परिवार का नाम हमेशा से केंद्रीय रहा है। इसी परिवार के करिश्माई नेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के युवा चेहरा रहे दुर्गा सोरेन का जीवन राजनीति की ऊँचाइयों और अचानक आई त्रासदी से भरा रहा। 10 सितंबर 1970 को जन्मे दुर्गा सोरेन, झामुमो सुप्रीमो और पूर्व केंद्रीय मंत्री शिबू सोरेन के बड़े बेटे थे। वे झारखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के बड़े भाई और झारखंड विधानसभा की पूर्व सदस्य सीता सोरेन के पति भी थे।

राजनीति में शुरुआती सफर

दुर्गा सोरेन ने राजनीति की शुरुआत बहुत कम उम्र में ही कर दी थी। 1995 में वे पहली बार जामा विधानसभा क्षेत्र से झामुमो प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतरे और जनता ने उन्हें विजयी बनाकर विधानसभा भेजा। 2000 तक वे इस सीट के विधायक रहे और इस दौरान उन्होंने इलाके में पार्टी को मजबूत करने के साथ-साथ कई जनसरोकार से जुड़े कार्य भी किए।

चुनावी हार और संघर्ष

2005 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने दोबारा जामा से किस्मत आजमाई, लेकिन इस बार उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार सुनील सोरेन के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी दुर्गा सोरेन का राजनीतिक सफर थमा नहीं। उन्होंने गोड्डा लोकसभा सीट से भी चुनाव लड़ा, लेकिन यहां भी भाजपा के निशिकांत दुबे से उन्हें पराजित होना पड़ा। लगातार हार के बावजूद दुर्गा सोरेन ने राजनीति से किनारा नहीं किया और झारखंड मुक्ति मोर्चा को और सशक्त बनाने में लगे रहे।

असमय निधन से टूटा परिवार और पार्टी

21 मई 2009 की सुबह की खबर ने पूरे झारखंड को स्तब्ध कर दिया। बोकारो स्थित अपने आवास पर नींद में ही दुर्गा सोरेन का निधन हो गया। बाद में डॉक्टरों ने उनकी मौत का कारण ब्रेन हैमरेज बताया। महज 38 वर्ष की आयु में इस तरह उनका जाना न सिर्फ सोरेन परिवार के लिए बल्कि झारखंड की राजनीति के लिए भी गहरी क्षति साबित हुआ।

परिवार और विरासत

दुर्गा सोरेन अपने पीछे माता-पिता शिबू और रूपी सोरेन, पत्नी सीता सोरेन और तीन बेटियों जयश्री सोरेन, राजश्री सोरेन और विजयश्री सोरेन को छोड़ गए। उनकी पत्नी सीता सोरेन बाद में जामा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहीं। भाजपा में जाने के बाद सीता सोरेन अपनी सफलता दोहरा नहीं पाईं और सदन के सदस्य के लिए संघर्षरत हैं।

झारखंड की राजनीति में योगदान

दुर्गा सोरेन की राजनीति को उनके संघर्ष और जनता से जुड़ाव के लिए याद किया जाता है। भले ही वे लंबे समय तक विधानसभा या संसद में सक्रिय भूमिका नहीं निभा पाए, लेकिन झामुमो के संगठन को मजबूत करने और आदिवासी-अल्पसंख्यक समाज की आवाज को बुलंद करने में उनका योगदान अहम रहा।

उनका जीवन यह दर्शाता है कि राजनीति सिर्फ सत्ता पाने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की सेवा और उनके मुद्दों को उठाने का जरिया भी है। दुर्गा सोरेन की अधूरी राजनीतिक यात्रा आज भी झारखंड की राजनीति में चर्चा का विषय है। इस आलेख के माध्यम से हम उन्हें नमन करते हैं।

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