New Delhi: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और चारों तरफ फैले शोर-शराबे के बीच शांति मानो कहीं खो गई है। ऐसे में सनातन परंपरा का ‘मौन व्रत’ न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए एक संजीवनी बनकर उभरा है। 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के अवसर पर इस सर्वोच्च तप का महत्व और भी बढ़ जाता है। मौन का अर्थ केवल बोलना बंद कर देना नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर की चेतना को जगाने की एक आंतरिक साधना है।

आयुर्वेद और दोषों का संतुलन : आयुर्वेद के अनुसार, अत्यधिक बोलना शरीर में वात दोष को बढ़ाता है। जब वात असंतुलित होता है, तो व्यक्ति को तनाव, अनिद्रा (Insomnia) और बेचैनी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मौन रहने से यह दोष संतुलित होता है और शरीर में ‘सत्व गुण’ की वृद्धि होती है। इससे व्यक्ति न केवल अधिक स्थिर महसूस करता है, बल्कि उसका क्रोध पर भी नियंत्रण बढ़ता है, जो सीधे तौर पर हृदय और ब्लड प्रेशर के स्वास्थ्य में सुधार लाता है।

मस्तिष्क के लिए ‘नेचुरल मेडिसिन’ : आधुनिक शोध भी अब मौन के उपचारात्मक प्रभावों की पुष्टि कर रहे हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि रोजाना कुछ समय मौन में बिताने से मस्तिष्क की नई कोशिकाओं के विकास को बढ़ावा मिलता है। इससे स्मरण शक्ति और सीखने की क्षमता में हां की तरह जादुई सुधार आता है। मौन रहने से तनाव बढ़ाने वाला हॉर्मोन ‘कोर्टिसोल’ कम होता है, जिससे नींद की गुणवत्ता सुधरती है और रचनात्मकता (Creativity) बढ़ती है।

भगवद्गीता और ओजस की रक्षा : श्रीमद्भगवद्गीता में मौन को मानसिक तप का स्वरूप और ‘गुह्य ज्ञान’ कहा गया है। वाणी पर संयम रखने से शरीर में ‘ओजस’ की रक्षा होती है, जिससे मानसिक शक्ति सशक्त बनती है। यह आत्मसंयम का सबसे सरल मार्ग है। मौनी अमावस्या पर लिया गया मौन का संकल्प हमें बाहरी दुनिया के कोलाहल से काटकर खुद से जुड़ने का अवसर देता है।

यदि हम प्रतिदिन कुछ मिनट मौन का अभ्यास करें, तो यह हमारे मस्तिष्क के लिए एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करेगा। यह न केवल हमारी ऊर्जा को संरक्षित करता है, बल्कि हमें एक संतुलित और जागरूक जीवन की ओर ले जाता है।

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