अपनी भाषा चुनेें :
बटन दबाकर थोड़ा इंतज़ार करें...
रांची: झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी (BM) ने धर्मांतरण और आरक्षण के लाभों को लेकर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के हालिया रुख का पुरजोर स्वागत किया है। उन्होंने इसे सामाजिक न्याय की दिशा में एक मील का पत्थर बताते हुए कहा कि अब उन लोगों पर लगाम लगेगी जो धर्म बदलकर भी दोहरे लाभ उठाने की कोशिश करते हैं।
सोशल मीडिया पर साझा किए विचार
बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि उच्चतम न्यायालय ने यह साफ कर दिया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य मजहब को अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा खो देता है। मरांडी के अनुसार, ऐसे व्यक्ति न तो आरक्षण का दावा कर सकते हैं और न ही एससी-एसटी एक्ट के तहत मिलने वाले विशेष संरक्षण के हकदार रह जाते हैं।
संविधान की भावना का सम्मान
पूर्व मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि आरक्षण की व्यवस्था एक विशिष्ट सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक पिछड़ेपन के आधार पर की गई थी। जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से उस सामाजिक दायरे को छोड़ देता है, तो वह उन लाभों के अधिकार से भी स्वतः बाहर हो जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा, “आरक्षण का लाभ लेना और साथ ही उस धर्म को छोड़ देना जिसके आधार पर वह लाभ मिला, संविधान की मूल भावना के पूरी तरह विपरीत है।”
धर्मांतरण के ‘संगठित नेटवर्क’ पर प्रहार
मरांडी ने समाज में सक्रिय कुछ ‘संगठित नेटवर्कों’ की ओर इशारा करते हुए गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में लोगों को प्रलोभन देकर धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जा रहा है, जिसके पीछे गहरे सामाजिक और आर्थिक हित छिपे होते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रयासों से न केवल समाज में भ्रम की स्थिति पैदा होती है, बल्कि आरक्षण जैसी संवेदनशील व्यवस्था का भी दुरुपयोग होता है।
उन्होंने अंत में कहा कि न्यायालय का यह फैसला सुनिश्चित करेगा कि आरक्षण का लाभ केवल उन्हीं ‘वास्तविक हकदारों’ तक पहुंचे, जिनके उत्थान के लिए बाबा साहेब और संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था बनाई थी। यह निर्णय सामाजिक न्याय और समान अवसर की भावना को और अधिक सशक्त बनाता है।

