Jaipur: राजस्थान के अलवर जिले में स्थित सरिस्का टाइगर रिजर्व अब अपनी पहचान बदल रहा है। बाघों के संरक्षण के लिए मशहूर यह रिजर्व अब ‘बर्ड सेंट्रिक टूरिज्म’ (पक्षी केंद्रित पर्यटन) के एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभर रहा है। प्रशासन की नई रणनीति के तहत सरिस्का और उसके आसपास के वेटलैंड्स को भरतपुर के केवलादेव घना पक्षी विहार की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है।
सिलीसेढ़ झील को रामसर साइट का दर्जा मिलने के बाद यहां ईको-टूरिज्म को बड़ी संजीवनी मिली है। अब यह झील केवल पिकनिक स्पॉट नहीं, बल्कि सात समंदर पार से आने वाले प्रवासी पक्षियों का सुरक्षित घर बन गई है। सिलीसेढ़ की इसी सफलता को देखते हुए अब करना का बास, मंगलसर, मानसरोवर बांध और कांकबाड़ी फोर्ट के पास स्थित जलस्रोतों को भी अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के प्रयास तेज हो गए हैं।
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सर्दियों के मौसम में साइबेरिया, यूरोप और मध्य एशिया से आने वाले मेहमान परिंदे सरिस्का की प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। यहां सुरक्षित वातावरण और प्रचुर मात्रा में भोजन उपलब्ध होने के कारण अब कई प्रजातियां यहां ब्रीडिंग (प्रजनन) भी करने लगी हैं। आंकड़ों की मानें तो सरिस्का और सिलीसेढ़ के क्षेत्र में 57 प्रवासी प्रजातियों सहित कुल 250 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं।
इस पहल से न केवल प्रकृति प्रेमियों और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर्स की संख्या बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। हाल ही में सिलीसेढ़ झील पर आयोजित हुआ पहला ‘बर्ड फेस्टिवल’ इस बात का प्रमाण है कि यह क्षेत्र पक्षी प्रेमियों की पहली पसंद बनता जा रहा है। अब पर्यटक सरिस्का में केवल टाइगर सफारी का ही आनंद नहीं लेंगे, बल्कि यहां की झीलों पर अठखेलियां करते परिंदों की दुनिया से भी रूबरू हो सकेंगे।



