Ranchi News: झारखंड में करीब पचास से ज्यादा बंद खुले कोल खदानों के जल का उपयोग उद्योग, जलापूर्ति, खेती किसानी में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि कुछ बंद खदानों के जल का इस्तेमाल मत्स्य पालन में हो रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

सीएमपीडीआई ने एक अध्ययन में पाया कि झारखंड के कोल खदानों में 1060 लाख किलोलीटर वार्षिक पानी मौजूद है। इसका बेहतर इस्तेमाल नहीं हो रहा है। अध्ययन में पाया कि झारखंड में परित्यक्त खुली कोयला खदानों को जैविक खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करके फाइटोप्लांकटन की वृद्धि को बढ़ावा देकर, हाइड्रिला जैसी जलीय वनस्पतियों को लगाकर और सबमर्सिबल पंप प्रणालियों का इस्तेमाल कर कई कामों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

अध्ययन में पाया इन खदानों में 1060 लाख किलोलीटर वार्षिक पानी मौजूद

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अध्ययन में कहा गया है कि हम इसे पीने योग्य भी बना सकते हैं। एक ओर राज्य सरकार नए-नए डैम, जलाशय के निर्माण कर रही है, वहीं वह इन खदानों के जल भंडार का इस्तेमाल कर जल की कमी को पूरा कर सकती है। झारखंड में कई कोल कंपनियों के पचास से ऊपर खदानें हैं। ये खदान पचास हेक्टेयर से लेकर तीन सौ हेक्टेयर में फैली हुई हैं। ये विशाल गहराई वाली हैं। हजारीबाग, खलारी, रामगढ़ आदि में बंद खदानों का इस्तेमाल मछली पालन के लिए किया जा रहा है।

खलारी में सीसीएल के एनके एरिया अंतर्गत करकट्टा ‘ए’ ब्लाक के दूसरा पार्ट, नौ नंबर बंद खदान में पानी भर गया था और अभी डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट फंड से केज कल्चर विधि से ग्रामीण मछली पालन कर रहे हैं। यहां से मोटर पंप द्वारा सीसीएल के कालोनियों में पानी की सप्लाई भी की जा रही है। यह एक दो उदाहरण है, लेकिन राज्य सरकार इसका इस्तेमाल कर सकती है। इस बार अच्छी बारिश से जलाशय भर गए हैं, लेकिन हर साल झारखंड जल संकट से जूझता है। भूमिगत जल तेजी से नीचे जा रहा है। खेती किसानी से लेकर पेयजल के लिए भी धरती के जल का दोहन कर रहे हैं।

झारखंड के खदानों का जल मामूली इस्तेमाल से पीने योग्य बनाया जा सकता है। जबकि पश्चिमी देशों में खदानों का पानी अम्लीय होता है लेकिन भारत की ज्यादातर कोयला खदानों से निकलने वाला खदान जल तुलनात्मक रूप से अच्छी गुणवत्ता का है और मामूली उपचार के बाद घरेलू, औद्योगिक और कृषि उपयोग में किया जा सकता है। बोतलबंद पानी के उत्पादन के लिए भी यह उपयुक्त हो सकता है। सीएमपीडीआई के अध्ययन सीपीसीबी वर्गीकरण और भारतीय मानक ब्यूरो 10500 मानकों के आधार पर खदान जल की गुणवत्ता का मानकीकरण किया है।

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