Palamu: मेदिनीनगर समाहरणालय सभागार में आयोजित जन समाधान दिवस का माहौल उस समय अचानक बदल गया, जब एक छोटी-सी सूचना ने पूरे कार्यक्रम को मानवीय संवेदना की मिसाल में बदल दिया। आमतौर पर फरियादियों की समस्याएं सुनने और उनके समाधान के लिए आयोजित इस कार्यक्रम में उस दिन प्रशासन का एक अलग ही चेहरा सामने आया—संवेदनशील, सजग और ज़मीन से जुड़ा हुआ।

कार्यक्रम अपने निर्धारित क्रम में चल ही रहा था कि उपायुक्त दिलीप प्रताप सिंह शेखावत को जानकारी मिली कि मेदिनीनगर की रहने वाली एक दिव्यांग महिला, शीला कुमारी, उनसे मिलने समाहरणालय पहुंची हैं। लेकिन दोनों पैरों से असमर्थ होने के कारण वह सीढ़ियां चढ़ पाने में असहाय हैं और नीचे ही इंतजार कर रही हैं। यह सूचना मिलते ही उपायुक्त ने बिना देर किए कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया। अधिकारियों और उपस्थित लोगों के बीच एक क्षण के लिए सन्नाटा छा गया, लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने सभी को भावुक कर दिया।

उपायुक्त स्वयं सभागार से निकलकर सीढ़ियों तक पहुंचे, जहां शीला कुमारी असहाय अवस्था में बैठी थीं। उन्होंने वहीं सीढ़ियों पर बैठकर न सिर्फ उनकी समस्या सुनी, बल्कि पूरे धैर्य और सम्मान के साथ उनसे बातचीत की। यह दृश्य प्रशासनिक औपचारिकताओं से परे जाकर एक मानवीय जुड़ाव का प्रतीक बन गया।

शीला कुमारी ने अपनी परेशानी साझा करते हुए बताया कि उन्हें लंबे समय से सरकारी सहायता और एक जरूरी दस्तावेज़ के लिए कई बार चक्कर लगाने पड़े हैं, लेकिन शारीरिक असमर्थता के कारण हर बार उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उनकी बात सुनते ही उपायुक्त ने मौके पर ही संबंधित विभाग के अधिकारियों को बुलाकर स्पष्ट निर्देश दिए कि मामले का त्वरित निपटारा सुनिश्चित किया जाए।

उपायुक्त ने महिला को आश्वस्त करते हुए कहा, “अब आपको बार-बार यहां आने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपका काम प्राथमिकता के आधार पर जल्द पूरा किया जाएगा।” उनके इस आश्वासन में सिर्फ प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि एक भरोसा और संवेदना झलक रही थी।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान वहां मौजूद अन्य फरियादी और अधिकारी भी इस दृश्य के साक्षी बने। कई लोगों ने इसे प्रशासन के मानवीय चेहरे का उदाहरण बताया, तो कुछ ने कहा कि ऐसे कदम आम लोगों के विश्वास को मजबूत करते हैं।

जन समाधान दिवस का यह क्षण केवल एक समस्या के समाधान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह संदेश दे गया कि जब प्रशासन संवेदनशील होता है, तो व्यवस्था में बदलाव अपने आप दिखने लगता है। सीढ़ियों पर बैठा वह संवाद आज मेदिनीनगर में चर्चा का विषय बना हुआ है—जहां पद नहीं, बल्कि मानवता सबसे ऊपर नजर आई।

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