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इस्लामाबाद। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रस्तावित ‘गाजा पीस बोर्ड’ में शामिल होने का फैसला प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए जी का जंजाल बन गया है। पाकिस्तान की ओर से इस न्योते को स्वीकार करते ही सरकार के भीतर और बाहर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। इस फैसले को न केवल नैतिक रूप से गलत बताया जा रहा है, बल्कि इसे फिलिस्तीनी स्वायत्तता पर हमला भी माना जा रहा है।
“यह नए जमाने की गुलामी है”
सीनेट में विपक्ष के नेता अल्लामा राजा नासिर अब्बास ने इस पहल पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि यह बोर्ड फिलिस्तीनी जनता से उनका स्वशासन छीनने की एक साजिश है। अब्बास के मुताबिक, “जब गाजा के पुनर्निर्माण और सुरक्षा की जिम्मेदारी बाहरी ताकतों को दे दी जाती है, तो यह शांति नहीं बल्कि ‘नए जमाने की गुलामी’ जैसा है।”
असीमित ताकत और अमेरिकी एजेंडा
तहरीक-ए-तहफ्फुज-ए-आइन-ए-पाकिस्तान के नेता मुस्तफा नवाज खोकर ने सरकार पर बिना चर्चा के फैसला लेने का आरोप लगाया। उनका तर्क है कि यह बोर्ड संयुक्त राष्ट्र (UN) के समांतर एक ऐसी व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश है, जहां ट्रंप के पास असीमित शक्तियां होंगी। इस बोर्ड में किसी भी एकतरफा फैसले को रोकने का कोई प्रावधान नहीं है, जो पाकिस्तान जैसे देशों के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
सरकार का बचाव: “मेज पर होना जरूरी है”
दूसरी तरफ, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री आसिफ ख्वाजा ने इस फैसले का पुरजोर बचाव किया है। उनका मानना है कि अगर पाकिस्तान इस वैश्विक मंच से दूर रहता है, तो अंतरराष्ट्रीय फैसलों में उसकी कोई अहमियत नहीं रह जाएगी। ख्वाजा ने दलील दी कि बोर्ड का हिस्सा बनकर ही पाकिस्तान अपने फिलिस्तीनी भाइयों के लिए मजबूती से आवाज उठा पाएगा।
दुनिया के 30 देशों पर नजर
व्हाइट हाउस के अनुसार, इस बोर्ड के लिए 50 देशों को न्योता भेजा गया है, जिनमें से पाकिस्तान के साथ अर्जेंटीना, यूएई, मिस्र और वियतनाम जैसे देशों ने अपनी सहमति दे दी है। हालांकि, मलीहा लोधी और जाहिद हुसैन जैसे अनुभवी विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने बिना सोचे-समझे आग में हाथ डाला है।

