रांची: झारखंड उच्च न्यायालय में आज एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus) पर सुनवाई के दौरान अदालती आदेश की अनदेखी भारी पड़ गई। न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रतिवादी मोहम्मद अब्दुल हकीम के खिलाफ नॉन-बेलेबल वारंट (NBW) जारी कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने या आदेश का उल्लंघन करने वालों के साथ कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक मां, अख्तरी खातून की गुहार से जुड़ा है, जिन्होंने अपने बेटे की तलाश के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पिछली सुनवाई के दौरान अदालत को यह अंदेशा हुआ था कि मामले में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जानबूझकर छिपाया जा रहा है। इसी संदेह के आधार पर अदालत ने चतरा के पुलिस अधीक्षक (SP) को गहन जांच कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया था। साथ ही, आज यानी 19 मार्च को याचिकाकर्ता अख्तरी खातून, मोहम्मद गुलाम और मोहम्मद अब्दुल हकीम को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होने को कहा गया था।
अदालत में नाराजगी और सख्त निर्देश
गुरुवार को जब सुनवाई शुरू हुई, तो मोहम्मद अब्दुल हकीम नदारद पाया गया। बिना किसी ठोस कारण के अदालत में हाजिर न होने पर खंडपीठ ने कड़ी नाराजगी जताई। राज्य सरकार की ओर से पक्ष रख रहे महाधिवक्ता राजीव रंजन की मौजूदगी में अदालत ने चतरा एसपी को कड़ा निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस मोहम्मद अब्दुल हकीम को गिरफ्तार करे और 1 अप्रैल 2026 को हर हाल में उसे अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
न्याय की उम्मीद में टिकी निगाहें
बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसे संवेदनशील मामलों में समय की महत्ता को देखते हुए हाई कोर्ट का यह रुख अपराधियों और कानून की अनदेखी करने वालों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। अब अगली सुनवाई 1 अप्रैल को होगी, जिसमें चतरा पुलिस की जांच रिपोर्ट और आरोपी की पेशी पर सबकी निगाहें टिकी रहेंगी।



