Jharkhand News: झारखंड आंदोलन के जननायक, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिशोम गुरु शिबू सोरेन की अंतिम यात्रा आज उनके पैतृक गांव नेमरा में संपन्न हो रही है। मंगलवार को जैसे ही उनका पार्थिव शरीर नेमरा पहुंचा, वैसे ही लोगों की भारी भीड़ अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़ी। अंतिम विदाई के इस भावुक क्षण में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, उनकी पत्नी कल्पना सोरेन, भाई बसंत सोरेन और पूरे झारखंड के नेता-जनता भावविह्वल होकर मौजूद रहे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन स्वयं अपने पिता के पार्थिव शरीर के साथ रांची से नेमरा तक की यात्रा में साथ रहे। शव वाहन जैसे ही नेमरा पहुंचा, पारंपरिक विधियों के साथ अंतिम दर्शन की प्रक्रिया शुरू हुई। लोगों ने “वीर शिबू अमर रहें” के नारों के साथ अपने प्रिय नेता को अंतिम सलामी दी।
धान के खेत से बना श्मशान घाट का रास्ता
विधानसभा में दी गई श्रद्धांजलि
दिल्ली से आए मल्लिकार्जुन खरगे और बिहार से तेजस्वी यादव
AAP नेता संजय सिंह भी हुए शामिल
हेलीपैड और सुरक्षा के खास इंतजाम
वीवीआईपी मेहमानों के लिए नेमरा गांव के समीप लुकैयाटांड़ में हेलीपैड बनाया गया है। वहां से नेमरा तक 7 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए विशेष गाड़ियों की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा की कमान डीसी फैज़ अक अहमद मुमताज और एसपी अजय कुमार ने संभाली है। सभी मार्गों पर बैरिकेडिंग की गई है, ताकि सुरक्षा में कोई चूक न हो।
गांव पहुंचने के लिए टोटो, ऑटो और बसों का सहारा
गुरुजी को श्रद्धांजलि देने के लिए आम लोग टोटो, ऑटो और बसों से गांव पहुंचे हैं। प्रशासन द्वारा छोटे वाहनों की व्यवस्था कर उन्हें मुख्यमंत्री के आवास तक पहुंचाया गया। रामगढ़ से लेकर नेमरा तक हजारों की संख्या में बैनर-पोस्टर लगे हैं, जिनमें गुरुजी को अंतिम जोहार अर्पित किया गया है।
कल्पना सोरेन ने संभाली व्यवस्था, बसंत सोरेन भी रहे मौजूद
गुरुजी को अंतिम विदाई देने उमड़ा जनसैलाब
गांव में श्रद्धांजलि देने वालों की भीड़ लाखों में पहुंच गई है। रांची से नेमरा तक शव यात्रा के हर पड़ाव पर लोगों ने फूल बरसाकर अंतिम दर्शन किए। “शिबू सोरेन अमर रहें” के नारों से गांव गूंज उठा। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की भारी तैनाती की गई है।
दिशोम गुरु का संघर्ष हमेशा रहेगा यादगार
शिबू सोरेन ने झारखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए वर्षों तक संघर्ष किया। वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने और कई बार संसद पहुंचे। उनका जीवन आदिवासी समाज के अधिकारों के लिए लड़ते हुए बीता। आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनके विचार और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेंगे।



