Bihar News: लोजपा-आर के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पीएम मोदी के हनुमान केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान सियासी शिगूफा से लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा करते रहे हैं। शाहाबाद के भोजपुर में उन्होंने सभा की। सारण में रविवार को उन्होंने सभाओं में एक कॉमन बात कही कि वे विधानसभा की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। एनडीए को मजबूत बनाने के लिए वे खुद विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे। उनकी बातों से एनडीए समर्थक कन्फ्यूज है। वे समझ नहीं पा रहे कि चिराग जब सभी सीटों पर लड़ेंगे तो एनडीए के बाकी दल क्या करेंगे।

लोजपा अगर सभी सीटों पर लड़ेगी तो NDA के बाकी दल क्या करेंगे?

बता दें चिराग यह भी कहते हैं कि वे शेर का बेटा हैं। किसी से डरते नहीं। अब सवाल है कि यह चेतावनी वे किसे दे रहे हैं। कौन उन्हें डरा रहा है। वे बिहार को विकसित बनाने के लिए आखिरी दम तक कोशिश करने की बात कहते हैं। उन्हें यह मौका तो तभी मिलेगा, जब सीएम की कुर्सी मिले। सीएम पद की कोई वैकेंसी न होने की बात भी वे कहते रहे हैं। ऐसे में कोई यह समझ नहीं पा रहा है कि चिराग आखिर चाहते क्या हैं।

चिराग पासवान लोकसभा में पांच सांसदों वाली पार्टी के नेता हैं। उन्हें मोदी मंत्रिमंडल में जगह भी मिली है। बीजेपी ने उनके चाचा पशुपति कुमार पारस के बजाय उन्हें तरजीह दी। इसमें डरने-डराने जैसी कोई बात नहीं दिखती। न डरने की धमकी शायद वे इसलिए दे रहे कि सीट शेयरिंग में उन्हें कमतर न आंका जाए। कभी 60 तो कभी 40 सीटों की मांग उनकी पार्टी करती है। उनकी पार्टी ने चिराग को बिहार के सीएम के रूप में भी पेश किया है। लोजपा-आर की इस कोशिश पर अभी तक एनडीए ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन किसी की समझ में नहीं आ रहा कि चिराग चाहते क्या हैं। वे सच में विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे या सिर्फ हवाबाजी बातें कर रहे कि ताकि उन्हें सीट बंटवारे में ज्यादा से ज्यादा सीटें मिल जाएं।

चिराग पासवान की पार्टी को बिहार में 5-6 प्रतिशत वोट मिलते हैं। इस वोट के आधार पर उनके 5 सांसद लोकसभा में चुने गए हैं। 2020 के चुनाव में चिराग ने इसी तरह के नखरे दिखाए थे। वे बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट के नारे के साथ जितनी सीटें चाहते थे, एनडीए में उतनी सीटें नहीं मिलीं तो उन्होंने बगावत कर दी थी। वे एनडीए से बाहर हो गए और अपने 134 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। उनके उम्मीदवार भी उन्हीं सीटों पर दबंगता के साथ थे, जहां जेडीयू के उम्मीदवार थे। उन्होंने बीजेपी को तो बख्श दिया, लेकिन नीतीश कुमार को निशाने पर रखा था। उनका एक ही उम्मीदवार जीता, जो बाद में जेडीयू का हिस्सा बन गया। अलबत्ता 34 सीटों पर उन्होंने जेडीयू को नुकसान पहुंचाया था।

जेडीयू को 43 सीटें मिली। डेढ़ दर्जन सीटें ऐसी रहीं, जहां चिराग की पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी। नीतीश कुमार से पंगा लेकर चिराग ने चालाकी की कि वे अपने को नरेंद्र मोदी का हनुमान बताने लगे। बीजेपी के खिलाफ उम्मीदवार उतारने से परहेज तो किया ही, बीजेपी ने जिन उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिया, उन्हें भी चिराग ने टिकट दे दिया। इसे यह बताकर प्रचारित किया गया कि बीजेपी के इशारे पर नीतीश कुमार को कमजोर करने के लिए उन्होंने ऐसा किया। यह बात निराधार साबित हुई। नीतीश कुमार को बीजेपी ने मना-समझा कर सीएम बना दिया।

बीजेपी और जेडीयू चिराग पासवान की ऐसी हरकतों पर खामोश हैं लेकिन बिहार में एनडीए के दोनों अग्रणी दलों की इस मुद्दे पर चुप्पी से एनडीए में शामिल पार्टियों के कार्यकर्ता-समर्थक की दुविधा बढ़ रही है। चूंकि बीजेपी के साथ चिराग की पटरी बैठ रही है, इसलिए उसके नेताओं को ही यह काम करना होगा कि चिराग को दुविधा फैलाने वाली बातें कहने से रोके। जेडीयू के अलावा बीजेपी के नेता भी खुल कर यह नहीं कहते कि नीतीश को छोड़ कर कोई बात हो सकती है। तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद बीजेपी या दूसरे सहयोगी दल नीतीश को सीएम बनाने के लिए तैयार हैं।

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