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रांची: झारखंड विधानसभा के बजट सत्र का 12वां दिन गरमागरम बहस के नाम रहा। जल संसाधन और विधि व्यवस्था विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान विपक्ष ने सरकार को आंकड़ों के जाल और अधूरी योजनाओं पर जमकर घेरा। विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी और रोशन लाल चौधरी ने राज्य की सिंचाई व्यवस्था और विस्थापन की नीति को ‘कागजी और दिशाहीन’ करार दिया।
सिंचाई का कछुआ चाल और 129 साल का गणित
गढ़वा विधायक सत्येंद्र नाथ तिवारी ने सदन में एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश किया। उन्होंने कहा कि झारखंड की 70% आबादी खेती पर टिकी है, लेकिन जल संसाधन विभाग को बजट का ऊंट के मुंह में जीरे के समान (मात्र 1 से 1.5%) हिस्सा मिलता है। तिवारी ने कटाक्ष करते हुए कहा, “जिस रफ्तार से सरकार काम कर रही है, राज्य की पूरी कृषि योग्य भूमि तक पानी पहुंचाने में 129 साल लग जाएंगे।” उन्होंने विभाग की कार्यक्षमता पर सवाल उठाते हुए बताया कि साल 2025-26 के लिए आवंटित 2257 करोड़ में से केवल 72% राशि ही खर्च हो पाई, क्योंकि विभाग के पास काम करने के लिए कर्मचारी ही नहीं हैं।
स्वर्णरेखा और कोणार : लागत बढ़ी, प्यास नहीं बुझी
सदन में अधूरी परियोजनाओं का मुद्दा भी गूंजा। विधायक रोशन लाल चौधरी ने ‘स्वर्णरेखा परियोजना’ का उदाहरण देते हुए बताया कि 1978 में जो योजना 128.89 करोड़ रुपये में शुरू हुई थी, उसकी लागत अब बढ़कर 14,949.74 करोड़ रुपये हो चुकी है। 48 साल बीत जाने के बाद भी यह परियोजना 70% अधूरी है। इसी तरह कोणार और भैरवी जलाशय योजनाओं की बदहाली पर भी चिंता जताई गई। बड़कागांव विधायक ने आरोप लगाया कि सरकार के वार्षिक प्रतिवेदन में सिंचाई क्षमता के आंकड़े पिछले दो सालों से एक जैसे ही हैं, जो साफ दर्शाता है कि जमीन पर काम के नाम पर केवल ‘कॉपी-पेस्ट’ का खेल चल रहा है।
विस्थापन का दर्द : “कागजों में सिमटा विस्थापन आयोग”
विस्थापन के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए विधायकों ने कहा कि पतरातू, ईचा और मैथन डैम जैसे प्रोजेक्ट्स ने 500 से अधिक गांवों को उजाड़ दिया और 5 लाख लोग प्रभावित हुए, लेकिन उन्हें आज तक न तो उचित मुआवजा मिला और न ही रोजगार। सत्येंद्र नाथ तिवारी ने मंडल डैम के 7000 विस्थापित परिवारों के लिए किसी ठोस नीति के अभाव पर चिंता जताई। रोशन लाल चौधरी ने मांग की कि सरकार ‘राज्य स्तरीय विस्थापन कार्ड’ जारी करे, ताकि प्रभावितों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।
कानून व्यवस्था और लंबित न्याय
विधि विभाग पर चर्चा करते हुए विधायकों ने अदालतों में जजों और कर्मचारियों की भारी कमी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि झारखंड हाईकोर्ट और निचली अदालतों में लाखों मामले लंबित हैं, जिससे ‘न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर’ साबित हो रही है। सत्येंद्र नाथ तिवारी ने अपने ऊपर लगे पुराने आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि राजनीतिक शुचिता के लिए ‘स्पीडी ट्रायल’ की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। अंत में, विपक्ष ने इस बजट को ‘दिखावे का दस्तावेज’ बताते हुए कहा कि जब तक किसानों के खेतों तक पानी और विस्थापितों को उनका हक नहीं मिलता, तब तक विकास की बातें बेमानी हैं।

