अपनी भाषा चुनेें :
बटन दबाकर थोड़ा इंतज़ार करें...
रांची: झारखंड की राजधानी स्थित बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) 9 अप्रैल से देश के कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं का केंद्र बनने जा रहा है। आगामी 9 से 11 अप्रैल तक यहाँ मक्का संबंधी ‘अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना’ की 69वीं वार्षिक कार्यशाला का आयोजन किया जाएगा। इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय आयोजन में देशभर के 250 से अधिक दिग्गज कृषि वैज्ञानिक जुटेंगे, जिनका लक्ष्य मक्का उत्पादन की नई दिशा तय करना है।
जलवायु परिवर्तन और मक्का का ‘रोडमैप’
कार्यशाला का मुख्य केंद्र बदलते मौसम (Climate Change) के बीच मक्का की उत्पादकता बढ़ाना है। वैज्ञानिक इस बात पर मंथन करेंगे कि कैसे कम पानी और बदलती परिस्थितियों में भी किसान मक्का की बंपर पैदावार ले सकें। इस दौरान मक्का उत्पादन के लिए एक ठोस रोडमैप तैयार किया जाएगा, जो आने वाले वर्षों में भारतीय कृषि की तस्वीर बदल सकता है। कार्यक्रम में उच्च उपज वाली नई किस्मों की पहचान की जाएगी और वर्ष 2025 की उपलब्धियों का लेखा-जोखा पेश होगा।
सिर्फ अनाज नहीं, औद्योगिक ‘सोना’ है मक्का
मक्का अब केवल थाली तक सीमित नहीं है। आयोजन सचिव डॉ. मणिगोपा चक्रवर्ती के अनुसार, मक्का का 85 प्रतिशत से अधिक उपयोग औद्योगिक कार्यों में हो रहा है। इसके बहुआयामी महत्व को देखते हुए इस कार्यशाला में स्टार्च, फीड, एथेनॉल, और बीज उद्योगों के प्रतिनिधि भी शामिल हो रहे हैं। आंकड़ों की बात करें तो:
-
पोल्ट्री और पशु आहार: मक्का का 55% हिस्सा पोल्ट्री और पशुओं के चारे में जाता है।
-
बायोफ्यूल क्रांति: लगभग 18% मक्का अब जैव ईंधन (Biofuel) के लिए इस्तेमाल हो रहा है, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम है।
-
उत्पादन में उछाल: पिछले पांच वर्षों में 6% की वृद्धि दर के साथ मक्का उत्पादन 43.41 मिलियन टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।
दिग्गज वैज्ञानिकों की मौजूदगी
इस भव्य कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ICAR के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट होंगे। साथ ही, मेक्सिको के अंतरराष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं सुधार केंद्र (CIMMYT) के विशेषज्ञ और देश के 37 कृषि विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि भी इसमें शामिल होकर अपनी शोध रिपोर्ट पेश करेंगे। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में होने वाला यह मंथन न केवल मक्का के क्षेत्र विस्तार में मदद करेगा, बल्कि एथेनॉल और स्टार्च जैसे उद्योगों को भी नई संजीवनी प्रदान करेगा।

