अपनी भाषा चुनेें :
बटन दबाकर थोड़ा इंतज़ार करें...
रांची: आधुनिक चकाचौंध और अंग्रेजी दवाओं के दौर में भी झारखंड का एक छोटा सा गांव अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। रांची स्थित बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी (BAU) ने हाल ही में लखाईडीह गांव के ग्राम प्रधान कान्हु राम टुडू को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया। यह सम्मान महज एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस प्राचीन ज्ञान का है जो लखाईडीह की पहाड़ियों में सदियों से छिपा है।
वैद्यराजों का गांव: जहाँ हर घर में है इलाज
सम्मान समारोह के दौरान कान्हु राम टुडू ने एक बेहद दिलचस्प बात साझा की। उन्होंने बताया कि लखाईडीह कोई साधारण गांव नहीं है, बल्कि इसे ‘वैद्यराजों का गांव’ कहा जाता है। यहाँ आज भी ग्रामीण इलाज के लिए बड़े अस्पतालों के बजाय अपने पूर्वजों से मिली आयुर्वेदिक पद्धति और प्राकृतिक जड़ी-बूटियों पर भरोसा करते हैं। यहाँ की आबोहवा में ही औषधियों का वास है।
पहाड़ों में छिपा है दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संसार
मंच से किसानों को संबोधित करते हुए ग्राम प्रधान ने बताया कि लखाईडीह के ऊंचे पहाड़ों और घने जंगलों में सैकड़ों ऐसी दुर्लभ जड़ी-बूटियां मौजूद हैं, जिनका उपयोग ग्रामीण पीढ़ी-दर-पीढ़ी करते आ रहे हैं। उन्होंने न केवल इन औषधियों को संरक्षित किया, बल्कि ऑर्गेनिक खेती (जैविक खेती) को बढ़ावा देकर यह साबित कर दिया कि बिना रसायनों के भी उन्नत खेती संभव है।
वैज्ञानिकों को खुला निमंत्रण: “आइए और परखिए हमारा ज्ञान”
कान्हु राम टुडू ने बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों को अपने गांव आने का न्योता देते हुए एक बड़ी मांग रखी। उन्होंने कहा कि उनके पारंपरिक ज्ञान को ‘वैज्ञानिक मान्यता’ मिलनी चाहिए ताकि इसका लाभ पूरे राज्य और देश के किसानों को मिल सके। कुलपति एस. सी. दुबे और कृषि वैज्ञानिकों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे प्राकृतिक खेती की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बताया।
इस कार्यक्रम में राज्य भर से आए किसानों ने लखाईडीह की इस ‘हर्बल क्रांति’ के बारे में जाना। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि विकास का रास्ता सिर्फ शहरों से होकर नहीं गुजरता, बल्कि हमारे गांवों के पारंपरिक ज्ञान में भी उन्नति के बड़े सूत्र छिपे हैं।

