India News: गुजरात का कच्छ एक बार फिर कुदरत के निशाने पर आता दिख रहा है। पिछले 24 घंटों में जिस तरह से धरती 24 बार कांपी है, उसने 2001 के उस काले मंजर की यादें ताजा कर दी हैं, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। शुक्रवार तड़के 4.30 बजे आए 4.6 तीव्रता के भूकंप के बाद आए ‘आफ्टरशॉक्स’ का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है, जिससे आम जनता के साथ-साथ वैज्ञानिक भी गहरी चिंता में हैं।

तीन ‘दुश्मन’ लाइनें एक साथ सक्रिय

भूवैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्ट ने खतरे की घंटी बजा दी है। जांच में पता चला है कि इस बार केवल एक नहीं, बल्कि तीन प्रमुख फॉल्ट लाइनें—कथरोल हिल, गोरा डोंगर और नॉर्थ वागड़ फॉल्ट—एक साथ सक्रिय हो गई हैं। कच्छ यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट प्रोफेसर गौरव चौहान का कहना है कि अब तक भूकंपीय गतिविधियां पुराने ज्ञात क्षेत्रों तक सीमित थीं, लेकिन अब तनाव नई फॉल्ट लाइनों की ओर खिसक रहा है। यह इस बात का संकेत है कि जमीन के भीतर ऊर्जा का भारी दबाव बन रहा है।

खतरा टला नहीं, बल्कि बढ़ गया है

विशेषज्ञों के अनुसार, हालांकि 1 से 3 तीव्रता के छोटे झटके ऊर्जा बाहर निकालने में मदद करते हैं, जिससे तुरंत किसी महा-भूकंप की आशंका थोड़ी कम होती है, लेकिन कई फॉल्ट लाइनों का एक साथ जागना भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। शुक्रवार को आए भूकंप का केंद्र जमीन की सतह से काफी कम गहराई पर था, यही वजह थी कि झटके पूरे कच्छ में बेहद तेज महसूस किए गए और लोग दहशत में अपने घरों से बाहर निकल आए।

अलर्ट मोड पर प्रशासन और जनता

वैज्ञानिकों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि कच्छ में आने वाला कोई भी बड़ा भूकंप केवल गुजरात तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर पूरे पश्चिमी भारत पर पड़ सकता है। अधिकारियों को सलाह दी गई है कि इसे महज ‘हल्के झटके’ मानकर नजरअंदाज न करें। अब समय आ गया है कि नियमित मॉक ड्रिल की जाए, भवन निर्माण के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए और हर घर में आपदा प्रबंधन की तैयारी शुरू की जाए। पाताल में मची यह बेचैनी हमें संभलने का आखिरी मौका दे रही है।

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