Pithoragarh: सदियों से करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र रहा कैलाश मानसरोवर का पारंपरिक पैदल मार्ग अब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनता जा रहा है। वह मार्ग, जिस पर कभी संतों और श्रद्धालुओं के कदमों की आहट सुनाई देती थी और ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष से पहाड़ गूंजते थे, आज कहीं सड़क निर्माण के मलबे में दब गया है तो कहीं घने जंगलों के बीच गुम हो गया है।

500 धर्मशालाएं बनीं खंडहर

इस लगभग 400 किलोमीटर लंबे प्राचीन मार्ग पर यात्रियों और व्यापारियों की सुविधा के लिए बनाई गई करीब 500 धर्मशालाएं आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही हैं। देख-रेख के अभाव और आधुनिक साधनों की सुलभता ने इन ऐतिहासिक ढांचों को खंडहर में तब्दील कर दिया है। ये धर्मशालाएं न केवल ठहरने का स्थान थीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता का संगम भी थीं, जहाँ कन्याकुमारी से लेकर काठगोदाम तक के यात्री एक छत के नीचे विश्राम करते थे।

सड़क नेटवर्क का विस्तार और सिमटती विरासत

इतिहासकारों के अनुसार, 1960 के दशक तक यात्री हल्द्वानी से पिथौरागढ़ और वहां से धारचूला होते हुए पैदल ही लिपुलेख दर्रा पार करते थे। लेकिन वक्त बदला और विकास की रफ्तार बढ़ी:

  • 1960: पिथौरागढ़ तक सड़क पहुंची।

  • 1970: टनकपुर-तवाघाट हाईवे बनने से धारचूला तक वाहनों का सफर शुरू हुआ।

  • 2020: सीमा सड़क संगठन (BRO) ने सड़क को सीधे लिपुलेख दर्रे से जोड़ दिया।

इस तकनीकी प्रगति ने यात्रा को सुगम तो बना दिया, लेकिन उन पारंपरिक पगडंडियों का अस्तित्व समाप्त कर दिया जो हमारी अमूल्य विरासत थीं।

विरासत बचाने की चुनौती

सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि 1962 के युद्ध के बाद व्यापार और यात्रा में आए अवरोधों ने भी इस मार्ग को काफी नुकसान पहुंचाया। यदि अब भी इन प्राचीन पैदल मार्गों और धर्मशालाओं के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ किताबों में ही ‘शिव पथ’ के गौरवशाली इतिहास को पढ़ पाएंगी। यह मार्ग केवल एक रास्ता नहीं, बल्कि भारत और तिब्बत के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों का जीता-जागता साक्ष्य रहा है।

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