Tehran, (Iran): मध्य पूर्व अब उस मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक असंभव थी। अयातुल्लाह अली खामेनेई (Ali Khamenei) की मौत की खबरों ने ईरान ही नहीं, पूरे मिडिल ईस्ट में हलचल मचा दी है। तेहरान से मिल रही जानकारियों के अनुसार इजरायल और अमेरिका के हमलों के बीच सुप्रीम लीडर के मारे जाने की सूचना सामने आई है। हालांकि इन खबरों की स्वतंत्र पुष्टि अब तक नहीं हुई है, लेकिन सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

करीब 47 साल से ईरान में इस्लामिक शासन कायम था। खामेनेई इस व्यवस्था के सबसे शक्तिशाली चेहरे माने जाते थे। उनके निधन की खबर ने देश की आंतरिक राजनीति को हिला दिया है। राजधानी तेहरान से लेकर दूसरे शहरों तक सियासी बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट साफ महसूस की जा रही है।

क्राउन प्रिंस की वापसी और सत्ता का नया केंद्र

ईरान में दशकों पुराने शासन के अंत के साथ ही निर्वासित जीवन जी रहे क्राउन प्रिंस रजा पहलवी की वापसी की चर्चाएं तेज हैं। अमेरिका समर्थित नई सरकार के गठन की संभावनाओं ने ईरान के नागरिकों में एक नई उम्मीद जगाई है। माना जा रहा है कि नया ईरान अब अपनी ‘कट्टरपंथी’ छवि त्याग कर पश्चिम के साथ मधुर संबंधों और आर्थिक प्रगति की ओर कदम बढ़ाएगा।

हमास, हूती और हिजबुल्लाह का भविष्य अधर में

ईरान के शासन परिवर्तन का सबसे बड़ा असर उसके द्वारा समर्थित ‘प्रॉक्सि’ संगठनों पर पड़ेगा। हमास (गाजा), हूती (यमन) और हिजबुल्लाह (लेबनान) जैसे संगठन अब तक तेहरान से मिलने वाले हथियारों और फंड पर निर्भर थे।

  • नेतृत्व संकट: ईरान की मदद रुकने से ये संगठन नेतृत्व और संसाधनों के अभाव में बिखर सकते हैं।

  • इजरायल का वर्चस्व: इन खतरों के कम होने से इजरायल अब इस क्षेत्र की निर्विवाद सैन्य और राजनीतिक शक्ति बनकर उभरेगा।

धार्मिक और क्षेत्रीय संतुलन में बदलाव

ईरान अब तक शिया जगत की सबसे बड़ी ताकत था। शासन बदलने से सुन्नी बहुल देशों (जैसे सऊदी अरब और यूएई) के साथ दशकों से चल रही प्रतिद्वंद्विता का स्वरूप बदल सकता है। ‘अब्राहम अकॉर्ड’ (Abraham Accords) को अब और मजबूती मिल सकती है, क्योंकि अब तक ईरान ही वह एकमात्र बड़ी दीवार थी जो अरब देशों और इजरायल के बीच खड़ी थी।

एक नए मध्य पूर्व की आहट

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रजा पहलवी के नेतृत्व में नया ईरान अपनी विदेश नीति को उदार बनाता है, तो दशकों से जारी खून-खराबे और युद्धों पर विराम लग सकता है। हालांकि, यह देखना चुनौतीपूर्ण होगा कि ईरान के भीतर मौजूद कट्टरपंथी गुट इस बड़े बदलाव को कितनी सहजता से स्वीकार करते हैं।

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