Tehran, Iran: वेस्ट एशिया (पश्चिम एशिया) में बारूद की गंध और तेज हो गई है। ईरान के ताजा दावों ने वाशिंगटन और यरूशलेम के सत्ता गलियारों में खलबली मचा दी है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने दो टूक शब्दों में कहा है कि उनके देश को रूस और चीन से केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक और सैन्य मोर्चे पर भी भरपूर सहयोग मिल रहा है। इस खुलासे के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी स्वीकार किया है कि रूस शायद ईरान की मदद कर रहा है। ट्रंप का मानना है कि चूंकि अमेरिका यूक्रेन का साथ दे रहा है, इसलिए पुतिन ईरान के साथ हाथ मिलाकर इसका बदला ले रहे हैं।

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पिछले एक दशक में ईरान और रूस के रिश्ते ‘दुश्मन का दुश्मन दोस्त’ वाली तर्ज पर फौलादी हुए हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान ईरान द्वारा रूस को दिए गए ‘शाहेद ड्रोन’ ने पहले ही पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। अब खबरें हैं कि रूस में इन ड्रोन्स को बनाने के लिए बड़े कारखाने भी लगाए जा रहे हैं। सीरिया में बशर अल-असद की सरकार को बचाने के लिए भी दोनों देशों ने कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है, जिसने अमेरिका के प्रभुत्व को सीधी चुनौती दी है।

चीन के साथ ’25 साल का प्लान’ और तेल का खेल

ईरान सिर्फ रूस ही नहीं, बल्कि चीन के साथ भी अपनी रणनीतिक साझेदारी को नए मुकाम पर ले गया है। साल 2021 में दोनों देशों के बीच हुआ 25 साल का व्यापक आर्थिक समझौता चीन की ऊर्जा सुरक्षा और ईरान की चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए लाइफलाइन साबित हो रहा है। इसके तहत चीन को ईरान से सस्ता तेल मिल रहा है, बदले में ईरान को भारी निवेश और तकनीक।

होरमुज जलडमरूमध्य: दुश्मनों के लिए ‘नो एंट्री’

अरागची ने रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण ‘होरमुज स्ट्रेट’ पर भी कड़ा रुख अपनाया है। दुनिया के कुल तेल और गैस की सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि यह जलमार्ग फिलहाल पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन अमेरिका, इजरायल और उनके समर्थक देशों के जहाजों के लिए यहां ‘नो एंट्री’ का बोर्ड लगा दिया गया है।

इस तनाव का सीधा असर दुनिया की जेब पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। जानकारों का मानना है कि यदि होरमुज में तनाव और बढ़ा, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को संभालना नामुमकिन हो जाएगा। पुतिन और शी जिनपिंग के समर्थन ने ईरान के हौसले इतने बुलंद कर दिए हैं कि अब अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए इस चक्रव्यूह से निकलना एक जटिल चुनौती बन गया है।

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