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World News: ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों ने अब पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि मस्जिदों और मदरसों को आग के हवाले किया जा रहा है। एक ऐसे देश में, जहां इस्लाम सामाजिक और राजनीतिक जीवन की रीढ़ माना जाता है, वहां पवित्र धार्मिक स्थलों पर हमले कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
सरकार का दावा है कि ये हमले आम प्रदर्शनकारियों के नहीं हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने कहा है कि अब तक करीब 250 मस्जिदों को नुकसान पहुंचाया गया है। उनके मुताबिक, यह काम विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे प्रशिक्षित दंगाइयों ने किया है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी सरकारी टीवी पर दावा किया कि मस्जिदों में आग लगाने वाले देश और विदेश में ट्रेनिंग पाए आतंकी हैं।
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सरकारी मीडिया ने जली हुई मस्जिदों की तस्वीरें दिखाते हुए सीधा आरोप मोसाद से जुड़े एजेंटों पर लगाया है। सरकार का कहना है कि इन हमलों का मकसद देश में अराजकता फैलाना और इस्लामी व्यवस्था को कमजोर करना है।
लेकिन ईरान के भीतर और बाहर कई विशेषज्ञ सरकार के इस नैरेटिव पर सवाल उठा रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों और स्वतंत्र विश्लेषकों का मानना है कि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल संभव नहीं है। कड़ी इंटरनेट पाबंदी और मीडिया सेंसरशिप के चलते सच्चाई तक पहुंचना मुश्किल बना हुआ है।
फ्रांस के लोरेन विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री सईद पेयवंडी इतिहास का हवाला देते हुए कहते हैं कि ईरान में पहले भी तथाकथित “फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन” हो चुके हैं। उनका कहना है कि 1994 में मशहद में एक पवित्र स्थल पर हुए धमाके को भी पहले विपक्ष पर थोपा गया था, लेकिन बाद में इसके तार सुरक्षा तंत्र से जुड़े पाए गए।
इस बहस को 2021 का एक पुराना वीडियो और हवा देता है, जिसमें पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद यह स्वीकार करते नजर आते हैं कि कई बार सादे कपड़ों में सुरक्षा बल ही हिंसा भड़काते हैं, ताकि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का रास्ता साफ हो सके।
विश्लेषकों का मानना है कि टीवी पर बार-बार जली मस्जिदों और फटे कुरान के पन्नों की तस्वीरें दिखाना भी एक रणनीति हो सकती है। इसका उद्देश्य धार्मिक तबके को यह संदेश देना है कि प्रदर्शनकारी सिर्फ सत्ता नहीं, बल्कि इस्लाम के खिलाफ खड़े हैं। फिलहाल, जलती इमारतों के बीच ईरान का सामाजिक ताना-बाना गहरे तनाव से गुजर रहा है।

