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Tehran, (Iran): आज मिडिल ईस्ट बारूद के ढेर पर है। तेहरान की सड़कों पर इजरायली बम गिर रहे हैं और जवाबी कार्रवाई में ईरानी मिसाइलें तेल अवीव को दहला रही हैं। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा सच दफन है जो आज की पीढ़ी को हैरान कर सकता है। जो देश आज एक-दूसरे के वजूद को मिटाने पर तुले हैं, वे कभी तेल के सबसे बड़े साझीदार हुआ करते थे। यह दोस्ती किसी मजबूरी या समझौते से नहीं, बल्कि ‘तेल की जरूरत’ से पैदा हुई थी।
स्वेज नहर का संकट और गुप्त समझौता— इस कहानी की शुरुआत 1967 के ‘छह दिवसीय युद्ध’ से होती है। जब मिस्र ने स्वेज नहर को बंद कर दिया, तो इजरायल के पास तेल मंगाने का और ईरान के पास तेल बेचने का कोई रास्ता नहीं बचा। इसी कूटनीतिक शून्य को भरने के लिए 1968 में दोनों देशों ने एक ज्वाइंट वेंचर शुरू किया। उन्होंने लाल सागर के इलात बंदरगाह से भूमध्य सागर के अशकेलोन तक 254 किलोमीटर लंबी एक गुप्त तेल पाइपलाइन बिछाई।
इस पाइपलाइन को दुनिया की नजरों से छिपाने के लिए पनामा और लिक्टेंस्टीन आधारित शेल कंपनियों का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA को इसकी भनक थी, जिसकी डीक्लासिफाइड रिपोर्ट बताती है कि ईरान इस पाइपलाइन के जरिए पूर्वी यूरोप तक अपना तेल पहुंचाता था।
दोस्ती की लाइफलाइन से युद्ध की आग तक— 42 इंच चौड़ी यह पाइपलाइन उस दौर में दोनों देशों की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन बन गई थी। यह रास्ता अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ के चक्कर काटने से कहीं ज्यादा सस्ता और सुरक्षित था। लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद वक्त की सुई ऐसी घूमी कि ‘तेल के यार’ जानी दुश्मन बन गए।
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आज के हालात यह हैं कि जहाँ कभी सुपरटैंकर तेल खाली करते थे, वहां अब खतरनाक युद्धपोत तैनात हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय वर्चस्व की जंग ने उस सीक्रेट पाइपलाइन को इतिहास के मलबे में दबा दिया है। जो तेल कभी सुलह का जरिया था, आज वही वैश्विक बाजार में आग लगा रहा है और नफरत की नई इबारत लिख रहा है।

