India News: अमेरिका लंबे समय से भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहा है, लेकिन इस बार तस्वीर उलटी दिख रही है। ताज़ा रिपोर्टों के मुताबिक, 2024 के सेशन में नए अंतरराष्ट्रीय छात्रों के नामांकन में 17 प्रतिशत की गिरावट आई है, और इसमें सबसे बड़ी कमी भारतीय छात्रों की है। यह गिरावट ऐसे समय दिखी है, जब अमेरिका ने छात्र वीज़ा और इमिग्रेशन नियम पहले से ज्यादा कड़े कर दिए हैं।
वीज़ा प्रक्रिया की कठोरता बनी सबसे बड़ी परेशानी
इंस्टिट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन (IIE) की रिपोर्ट में 825 अमेरिकी संस्थानों के आंकड़े शामिल हैं। इनमें से 96 प्रतिशत कॉलेजों ने माना कि वीज़ा नियम और जटिलताएं इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह हैं। कई छात्रों को वीज़ा इंटरव्यू में देरी, अतिरिक्त जांच, सोशल मीडिया अकाउंट चेक और कागज़ों की बार-बार समीक्षा जैसी दिक्कतों से गुजरना पड़ा। कुछ छात्रों के वीज़ा तो नवीनीकरण के दौरान ही रद्द कर दिए गए।
इसी वजह से कई भारतीय छात्रों ने समय पर अमेरिका पहुंचना ही छोड़ दिया और विकल्प के तौर पर कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों को चुन लिया। भारत अभी भी अमेरिका का सबसे बड़ा छात्र स्रोत है, लेकिन मौजूदा नीतियों ने छात्रों का भरोसा कमजोर किया है।
यूनिवर्सिटीज को बढ़ता आर्थिक नुकसान
अमेरिका में अभी करीब 12 लाख विदेशी छात्र पढ़ते हैं, जो हर साल लगभग 55 अरब डॉलर अर्थव्यवस्था में जोड़ते हैं। इन छात्रों पर घरेलू वित्तीय सहायता लागू नहीं होती, इसलिए वे पूरी ट्यूशन फीस देते हैं। यही कारण है कि जब भारतीय और अन्य विदेशी छात्रों की संख्या घटी, तो कई विश्वविद्यालयों की सीटें खाली रह गईं और राजस्व में सीधा नुकसान दर्ज हुआ।
रिपोर्ट कहती है कि 57 प्रतिशत संस्थानों में दाखिले में गिरावट आई है, जबकि सिर्फ 29 प्रतिशत में बढ़ोतरी देखने को मिली। घरेलू दाखिले पहले ही कम हो रहे हैं और सरकारी फंडिंग भी घट रही है, ऐसे में विदेशी छात्रों का कम होना अमेरिकी उच्च शिक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन रहा है।



