गुमला/चैनपुर: सरकार लाख दावे करे कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत किया जा रहा है, लेकिन चैनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की वस्तुस्थिति इन दावों को कठघरे में खड़ा कर देती है। करोड़ों रुपये खर्च कर बनाए गए भवन और संसाधन एक-एक कर जर्जर या बेकार होते जा रहे हैं, क्योंकि यहां तैनात डॉक्टर ड्यूटी पर कम और छुट्टी पर ज्यादा देखे जाते हैं। हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि छोटे-मोटे उपचार के लिए भी मरीजों को सीधे सदर अस्पताल गुमला भेजा जा रहा है। सवाल उठता है—जब प्राथमिक स्तर पर ही सिस्टम पस्त है, तो “बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं” का दावा आखिर किस आधार पर किया जा रहा है?

रोस्टर में ‘ड्यूटी’, जमीन पर ‘छुट्टी’—कैसी है व्यवस्था?

ग्रामीणों की शिकायतें सिर्फ रोष नहीं, बल्कि दर्द की कहानी भी बयां करती हैं। लोग बताते हैं कि अस्पताल में डॉक्टरों की मौजूदगी भाग्य और संयोग पर निर्भर हो गई है। कागजों में पूरा रोस्टर चमचमाता है, लेकिन अस्पताल में दिनभर ताला झूलता दिख जाता है।
सीएचसी में तैनात चिकित्सा अधिकारियों के लिए करोड़ों रुपये की लागत से सरकारी आवास बनाए गए—आलीशान कमरे, पानी-बिजली की सुविधा, सब कुछ। लेकिन डॉक्टरों को “रहने में दिक्कत होती है”, इसलिए वे रहना नहीं चाहते। यह दिक्कत क्या है—उसका जवाब किसी के पास नहीं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि “जितना समय डॉक्टरों के नाम बोर्ड पर लिखने में जाता है, उससे कम समय वे अस्पताल में रहते हैं।” जनप्रतिनिधियों द्वारा बार-बार शिकायत के बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने नोटिस तक जारी करने की जहमत नहीं उठाई।

 

 

 

 

 

 

तीन दिन तक भटकती रही मां—और तब लगा इंजेक्शन

लापरवाही की ताजा मिसाल कुमुदिनी लकड़ा के मासूम बच्चे के मामले ने उजागर की। बच्चे को कुत्ता काट गया था—ऐसा मामला जिसमें एक मिनट की देरी भी खतरनाक हो सकती है। लेकिन चैनपुर सीएचसी में डॉक्टरों की ‘अनुपस्थिति’ के कारण तीन दिनों तक मां-बच्चे को सिर्फ “नहीं है डॉक्टर” की लाइन सुननी पड़ी।

बेबस मां रोज सुबह आती, रोज वापस लौटा दी जाती।
कोई पूछने वाला नहीं।
कोई जिम्मेदारी लेने वाला नहीं।

जब मामला जेएसएलपीएस की सेतु दीदी जंतुन खातून के पास पहुंचा, तब जाकर सिस्टम की नींद टूटी। उन्होंने तुरंत सीएचसी के बीपीएम से संपर्क किया, कड़ी नाराजगी जताई और कार्रवाई की मांग की। दबाव बढ़ा, तो अंत में बच्चे को एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगाया गया।
एक मासूम की जिंदगी को तीन दिन लटकाने वाला यह सिस्टम आखिर किसे जवाब देगा?

ग्रामीणों का गुस्सा उफान पर—उग्र आंदोलन की चेतावनी

चैनपुर और आसपास के गांव के लोग अब खुलकर बोल रहे हैं। उनका कहना है कि—
“सरकार सिर्फ कागजों में सुविधा दे रही है। जमीन पर तो लोग मरने को मजबूर हैं।”

ग्रामवासियों ने चेतावनी दी है कि अगर डॉक्टरों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हुई, और स्वास्थ्य केंद्र को दुरुस्त नहीं किया गया, तो वे बड़े आंदोलन की राह पर उतरेंगे।
लोग अब यह सवाल उठा रहे हैं—

  • किसके भरोसे चल रहा है चैनपुर सीएचसी?

  • कौन जवाबदेह है इन लापरवाहियों का?

  • क्यों करोड़ों के भवन सिर्फ ‘शो-पीस’ बनकर रह गए हैं?

  • कब जागेगा स्वास्थ्य विभाग?

किसकी जिम्मेदारी? कौन देगा जवाब?

डॉक्टरों की अनुपस्थिति, मरीजों की बेबसी, संसाधनों की बर्बादी—इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ग्रामीणों की जान की कीमत शून्य मानी जा चुकी है? चैनपुर सीएचसी की यह स्थिति सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, सीधे-सीधे आम जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ है।

Share.
Exit mobile version