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Tehran (Iran): अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब दूसरी बार अमेरिका की सत्ता संभाली थी, तो उन्होंने मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के नारे के साथ देश को महानता के एक नए दौर में ले जाने का वादा किया था। अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की नीतियों की आलोचना करते हुए उन्होंने एक सशक्त और अजेय अमेरिका की तस्वीर पेश की थी, लेकिन आज जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत खड़ी है। ईरान के साथ शुरू हुए युद्ध ने न केवल ट्रंप की लोकप्रियता को गर्त में धकेल दिया है, बल्कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश की अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भी धूल चटा दी है। सुपरपावर की वह हेकड़ी जो कभी धमकियों के दम पर दुनिया को झुकाती थी, आज वैश्विक मंच पर संघर्ष करती नजर आ रही है।
ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका की स्थिति का अंदाजा विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षणों से लगाया जा सकता है, जो बताते हैं कि उनकी लोकप्रियता में रिकॉर्ड गिरावट आई है। जो ट्रंप चुनाव के समय बेहद लोकप्रिय थे, आज उनकी स्वीकार्यता दर गिरकर मात्र 34-37 प्रतिशत रह गई है, जबकि 60 प्रतिशत से अधिक अमेरिकी नागरिक उनके निर्णयों को खारिज कर रहे हैं। विशेषकर ईरान युद्ध को लेकर 54-61 प्रतिशत जनता ने अपनी नापसंदगी जाहिर की है। आम अमेरिकी नागरिक युद्ध की वजह से बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतों से त्रस्त है। युद्ध से पहले स्थिर रहने वाली पेट्रोल-डीजल की कीमतें अब 34-50 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं, जिसने घरेलू बजट को पूरी तरह बिगाड़ दिया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अमेरिका अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। जो देश कभी ट्रंप की धमकियों से सहम जाते थे, अब वे खुलकर उनके खिलाफ बोल रहे हैं। कनाडा, क्यूबा और मेक्सिको जैसे पड़ोसी देशों का रुख सख्त हुआ है, तो वहीं ग्रीनलैंड मामले और ईरान युद्ध के बाद नाटो देशों के साथ अमेरिका के संबंध लगभग बिखर चुके हैं। यूरोपीय देशों द्वारा अपना अलग स्टैंड लेने के कारण अमेरिका का वह प्रभाव खत्म हो गया है, जिसके दम पर वह नाटो को नियंत्रित करता था। स्ट्रैट ऑफ होर्मुज को लेकर शुरू किया गया प्रोजेक्ट फ्रीडम ईरानी हमलों के बाद ठप पड़ चुका है, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया है और अमेरिकी शेयर बाजार अस्थिर हो गए हैं।
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब ईरान को तबाह करने की धमकी देने वाले ट्रंप अब पाकिस्तान जैसे देशों के माध्यम से युद्धविराम की मिन्नतें कर रहे हैं। एक तरफ बमबारी की धमकी और दूसरी तरफ 14 सूत्रीय समझौते के जरिए प्रतिबंध हटाने और फंड छोड़ने का प्रस्ताव, ट्रंप प्रशासन की दोहरी नीति और घबराहट को उजागर कर रहा है। ईरान ने अमेरिका को इस कदर झुकने पर मजबूर कर दिया है कि अब ट्रंप केवल डील का नाम लेकर अपनी साख बचाने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस युद्ध ने अमेरिका को सिवाय बदनामी, आर्थिक बोझ और गिरती साख के कुछ नहीं दिया है।
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