वॉशिंगटन (अमेरिका) | एजेंसी

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा भीषण युद्ध समाप्त होने के बजाय और भी उलझता नजर आ रहा है। ईरानी राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए ताजा ‘शांति प्रस्ताव’ पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुरी तरह भड़क गए हैं। ट्रंप ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस कूटनीतिक असहमति ने पिछले दो महीनों से जारी युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों को एक बड़ा झटका दिया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और महंगाई पर संकट और गहरा गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने अपने प्रस्ताव में एक ‘स्टेप-बाय-स्टेप’ योजना पेश की थी। इसमें सुझाव दिया गया था कि पहले युद्धविराम हो और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को खोला जाए, जबकि परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा युद्ध पूरी तरह खत्म होने के बाद की जाए। हालांकि, ट्रंप प्रशासन इस पर कतई राजी नहीं है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता ओलिविया वेल्स ने साफ किया कि अमेरिका के लिए परमाणु मुद्दा सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी समझौते की बुनियाद यही मुद्दा होना चाहिए। इसी गतिरोध के चलते ट्रंप ने अपने खास दूत स्टीव विटकॉफ और सलाहकार जेरेड कुशनर का प्रस्तावित इस्लामाबाद दौरा भी रद्द कर दिया है।

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दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने कूटनीतिक मोर्चा खोल रखा है। ओमान और पाकिस्तान के बाद उन्होंने रूस में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की, जहां उन्हें मॉस्को का मजबूत समर्थन मिला। अराकची का तर्क है कि अमेरिका बातचीत की मेज पर इसलिए आना चाहता है क्योंकि वह युद्ध के मैदान में अपने मंसूबों में नाकाम रहा है। ईरान चाहता है कि भविष्य में संघर्ष न होने की गारंटी मिले और उसके यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को अंतरराष्ट्रीय मान्यता दी जाए।

गौरतलब है कि 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) से ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में अमेरिका को अलग कर लिया था, जिसके बाद से दोनों देशों के बीच भरोसे की खाई और चौड़ी हो गई है। वर्तमान स्थितियों को देखते हुए ऐसा लगता है कि ट्रंप ‘मैक्सिमम प्रेशर’ (अधिकतम दबाव) की नीति पर ही आगे बढ़ेंगे। समाधान की राह अब और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है, क्योंकि एक तरफ ट्रंप की जिद है और दूसरी तरफ रूस के समर्थन से लबरेज ईरान का आत्मविश्वास।

आंकड़ों और कूटनीति का गणित: परमाणु मुद्दा क्यों है अहम?

अमेरिका का मानना है कि यदि ईरान को परमाणु शक्ति बनने से नहीं रोका गया, तो यह पूरे मिडिल ईस्ट की सुरक्षा के लिए खतरा होगा। वहीं, ईरान इसे अपना संप्रभु अधिकार मानता है। 2015 के समझौते के टूटने के बाद से ईरान ने यूरेनियम संवर्धन की सीमा काफी बढ़ा दी है, जो अमेरिका के लिए ‘रेड लाइन’ (Red Line) है। ट्रंप की हालिया नाराजगी यह संकेत देती है कि आने वाले दिनों में ईरान पर आर्थिक और सैन्य प्रतिबंध और भी कड़े हो सकते हैं।

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